
Rama Devi Sahu
132 days ago
नर्मदा नदी की पौराणिक और लोक कथाएँ अत्यंत विस्तृत और भावुक हैं। इनमें से सबसे प्रमुख और लोकप्रिय कथा नर्मदा, सोनभद्र और जोहिला के त्रिकोण प्रेम और विरह की है, जो यह बताती है कि क्यों नर्मदा अन्य नदियों के विपरीत दिशा में बहती है। प्राचीन काल की बात है, नर्मदा (जो राजा मेखल की पुत्री मानी जाती हैं) और सोनभद्र (एक शक्तिशाली राजकुमार या नद) के बीच विवाह तय हुआ था। दोनों के बीच प्रेम पत्राचार था, हालांकि उन्होंने एक-दूसरे को देखा नहीं था। राजकुमार सोनभद्र के वैभव और वीरता की कहानियाँ सुनकर नर्मदा उनसे प्रभावित थीं। विवाह का शुभ मुहूर्त निकट था। उत्सुकता वश, नर्मदा ने अपनी प्रिय सखी और दासी 'जोहिला' को सोनभद्र के पास भेजा ताकि वह देख सके कि राजकुमार कैसे दिखते हैं और उन्हें उपहार दे सके। नर्मदा ने प्रेम स्वरूप अपना रेशमी दुपट्टा और आभूषण जोहिला को दिए। जब जोहिला सोनभद्र के पास पहुँची, तो वह राजकुमार के ठाठ-बाट और रूप को देखकर मंत्रमुग्ध हो गई। उसने नर्मदा के दिए हुए आभूषण खुद पहन लिए और सोनभद्र के सामने राजकुमारी बनकर प्रस्तुत हुई। सोनभद्र भी उसे ही राजकुमारी नर्मदा समझ बैठे और उन पर मोहित हो गए। काफी समय बीत गया और जोहिला वापस नहीं आई। चिंतित होकर नर्मदा स्वयं सोनभद्र से मिलने चल पड़ीं। जब वे वहाँ पहुँचीं, तो उन्होंने देखा कि उनके होने वाले पति सोनभद्र उनकी दासी जोहिला के साथ प्रेम-विहार कर रहे थे। इस धोखे को देखकर नर्मदा आत्मग्लानि और क्रोध से भर उठीं। उन्हें अपनी सखी और प्रियतम, दोनों से ही घृणा हो गई। उन्होंने उसी क्षण निर्णय लिया कि वह इस रिश्ते को स्वीकार नहीं करेंगी। क्रोध में भरी नर्मदा तुरंत पीछे मुड़ गईं और विपरीत दिशा (पश्चिम की ओर) चल पड़ीं। सोनभद्र को जब अपनी भूल का एहसास हुआ, तो उन्होंने नर्मदा को बहुत पुकारा और रोकने की कोशिश की, लेकिन नर्मदा ने पलटकर नहीं देखा। उन्होंने आजीवन 'कुमारी' रहने का संकल्प लिया और कहा कि वह अब कभी किसी से नहीं मिलेंगी। यही कारण है कि भौगोलिक रूप से भी नर्मदा नदी, सोन और जोहिला (जो अंततः सोन में मिल जाती है) से अलग होकर पश्चिम की ओर बहती है, जबकि भारत की अन्य बड़ी नदियाँ पूर्व की ओर जाती हैं। नर्मदा के उद्गम की दूसरी कथा (शिव का वरदान) एक अन्य धार्मिक मान्यता के अनुसार, जब अंधकासुर के वध के बाद भगवान शिव अत्यधिक क्रोधित और पसीने से तर-बतर थे, तब उनके पसीने की बूंदों से अमरकंटक की पहाड़ियों पर एक तेजस्विनी कन्या का जन्म हुआ। शिव उस कन्या की सुंदरता और पवित्रता से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने उसे वरदान दिया कि वह युगों-युगों तक अक्षुण्ण रहेगी और उसका अस्तित्व कभी समाप्त नहीं होगा। माना जाता है कि जब पूरी दुनिया में प्रलय आता है और सब कुछ जलमग्न हो जाता है, तब भी नर्मदा का अस्तित्व बना रहता है। इसीलिए इसे 'अविनाशी' नदी भी कहा जाता है। नर्मदा की कहानी इसके 'परिक्रमा' के बिना अधूरी है। यह विश्व की एकमात्र ऐसी नदी है जिसकी पूरी परिक्रमा की जाती है। श्रद्धालु अमरकंटक से अपनी यात्रा शुरू करते हैं, नदी के किनारे-किनारे अरब सागर (भड़ौच) तक जाते हैं और फिर दूसरी तरफ से वापस अमरकंटक लौटते हैं। यह लगभग 3,312 किलोमीटर की कठिन यात्रा है, जिसे लोग श्रद्धा के साथ महीनों में पूरा करते हैं।

Comments (4)

Rama Devi Sahu
Apr 27, 2026
🙏🔱 Om Namah Shivay 🔱 Har Har Mahadev 🔱🙏 Shubha Somavar or Mohini Ekadashi ki Hardik Shubhkamnaye ke Sath Shubha Dopahar Jii 🌹🌹

Pannalal panchal
Apr 27, 2026
ॐ नमः शिवाय

Rama Devi Sahu
Apr 26, 2026
🙏🔱 Har Har Mahadev 🔱🙏

Pannalal panchal
Apr 26, 2026
मां नर्मदे हर हर
