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Rama Devi Sahu

331 days ago

#विलक्षण_गुरुदक्षिणा आचार्य द्रोणका अपमान उनके सहपाठी पाञ्चाल नरेश द्रुपदने यह कहकर कर दिया कि 'एक राजाकी तुम्हारे-जैसे श्रीहीन और निर्धन मनुष्यके साथ कैसी मित्रता?' इस तरह राजा द्रुपदसे अपमानित हो बदला लेनेकी भावनासे आचार्य द्रोण हस्तिनापुरमें राजकुमारोंको अस्त्र-शस्त्रकी शिक्षा देने लगे। राजा द्रुपदका व्यवहार इन्हें सदैव दुःख देता था। एक दिन आचार्य द्रोणने अपने शिष्योंसे कहा कि मेरे मनमें एक कार्य करनेकी इच्छा है। शिक्षा प्राप्त करनेके बाद कौन उसे पूरा करेगा ? सब चुप हो गये; परन्तु अर्जुनने उस कार्यको पूरा करनेका संकल्प प्रकट किया। इसपर प्रसन्न होकर आचार्यने उन्हें अपना सर्वश्रेष्ठ शिष्य होनेका आशीर्वचन दिया। द्रोणाचार्यसे शिक्षा पानेके लिये सहस्त्रों राजकुमार एकत्र होने लगे। द्रोणाचार्यकी प्रशंसा सुनकर निषादराज हिरण्यधनुका पुत्र एकलव्य भी वहाँ आया, पर कौरवोंके कारण आचार्यने उसे निषादपुत्र समझकर शिष्य नहीं बनाया। किंतु 'जहाँ चाह होती है वहाँ राह निकल ही आती है' — एकलव्यने वनमें लौटकर उनकी मिट्टीकी मूर्ति बनायी तथा उसीमें ही उसने गुरुकी परमोच्च भावना रखकर उसके सामने धीरे-धीरे अभ्यासके बलपर धनुर्विद्यामें बड़ी अच्छी कुशलता प्राप्त कर ली। एक दिन शिकारकी इच्छासे आचार्यके सभी शिष्य एक कुत्तेके साथ उसी वनमें आये। सब लोग शिकारकी खोजमें इधर-उधर विचरने लगे। कुत्ता भी घूमता-घामता उस जगह पहुँच गया, जहाँ एकलव्य अभ्यास कर रहा था। मैले-कुचैले काले रंगके आदमीको हाथमें धनुष-बाण लिये देखकर कुत्ता वहींपर खड़ा होकर 'भौं-भौं' करके भँकने लगा। अपने अभ्यासमें आया व्यवधान देखकर एकलव्यने इतनी फुर्तीसे बाण चलाया कि कुत्तेको चोट तो नहीं लगी, पर उसका मुँह बाणोंसे भर गया। अब वह भौंक नहीं सकता था, उसी अवस्थामें कुत्ता पाण्डवोंके पास लौट आया। सबने सोचा कि यह कार्य तो हममेंसे कोई भी नहीं कर सकता। आखिर वह सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर है कौन ? खोज की गयी। सबने देखा कि द्रोणाचार्यकी मूर्तिके सामने एक भारी-भरकम आदमी निरन्तर आश्चर्यजनक गतिसे बाण छोड़ रहा है, और कठिन-से-कठिन लक्ष्यका भेदन भी कर रहा है। सभीने आकर द्रोणाचार्यको यह घटना सुनायी। सभीका अभिमान जाता रहा कि हमने गुरु द्रोणाचार्यसे अच्छी शिक्षा प्राप्त की है, विशेषकर अर्जुनका । एकान्त पाकर उलाहनाभरे शब्दोंमें अर्जुनने द्रोणाचार्यसे कहा कि आपने तो मुझसे कहा था कि तुमसे बढ़कर मेरा कोई भी शिष्य न होगा। फिर आपका यह शिष्य अस्त्रविद्यामें मुझसे बढ़कर कुशल तथा पराक्रमी कैसे हुआ ? आचार्य गहरे सोचमें पड़ गये। कुछ समयतक वे सोचते-विचारते रहे; फिर सव्यसाची अर्जुनको साथ ले एकलव्यके पास गये। उन्होंने देखा कि उनकी मूर्ति बनी है और उससे पूछ-पूछकर एकलव्य बाण चलानेका अभ्यास बड़ी निष्ठासे कर रहा है। द्रोणाचार्य उसे देखकर आश्चर्यचकित हो गये और मन-ही-मन उसकी प्रशंसा करने लगे। इतनेमें एकलव्यका ध्यान अर्जुनके साथ खड़े गुरु द्रोणाचार्यकी तरफ गया। उसने दौड़कर जमीनपर मस्तक रखकर अपनी गुरुभक्ति दिखायी। हाथ जोड़कर एकलव्य उनके सामने खड़ा हो गया और पूछा कि 'मैं आपकी क्या सेवा करूँ ?' किंतु द्रोणाचार्यके मनमें इस समय तो कुछ और ही था। उन्होंने कहा— 'वीर ! यदि तुमने मुझे गुरु मानकर शिक्षा ग्रहण की है तो मुझे गुरुदक्षिणा दो।' एकलव्यने कहा— 'गुरुदेव ! मेरे पास कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो गुरुके लिये अदेय हो। आप आज्ञा करें।' द्रोणाचार्यने उससे उसके दाहिने हाथका अँगूठा माँग लिया। इतना दारुण वचन सुनकर भी वह न तो घबराया न उसने कुछ सोच-विचार ही किया। उसने तुरन्त ही प्रसन्नमनसे तलवारसे अपना दाहिना अँगूठा काटकर उन्हें दे दिया। एकलव्यकी निष्ठा तथा गुरुभक्ति देखकर द्रोणाचार्यका हृदय भर आया। 🌿🍂☘️🌿🍂☘️🌿🍂☘️🌿🍂☘️🌿🍂☘️🌿 ❀༺꧁||🙏जय माँ🙏|

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