
Rama Devi Sahu
127 days ago
सीता नवमी, जिसे जानकी नवमी भी कहा जाता है, माता सीता के प्राकट्य (जन्म) का उत्सव है। शास्त्रों के अनुसार, यह पर्व वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाया जाता है। सीता नवमी की कथा महाराज जनक और उनके भक्ति भाव से जुड़ी है पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक समय मिथिला राज्य में भयंकर अकाल पड़ा। वर्षा न होने के कारण प्रजा त्राहि-त्राहि कर रही थी और धरती पूरी तरह सूख चुकी थी। राजा जनक इस समस्या के समाधान के लिए ऋषियों के पास गए। ऋषियों ने उन्हें परामर्श दिया कि यदि राजा स्वयं खेत में हल चलाएं, तो इंद्र देव प्रसन्न होंगे और वर्षा होगी। अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए राजा जनक ने खेत में हल चलाना शुरू किया। हल चलाते समय हल का अगला हिस्सा (जिसे 'सीत' कहा जाता है) एक धातु के कलश से टकराया। जब उस कलश को जमीन से बाहर निकाला गया, तो उसमें एक अत्यंत सुंदर और तेजस्विनी कन्या मुस्कुरा रही थी। चूंकि हल के 'सीत' के टकराने से यह कन्या प्राप्त हुई थी, इसलिए इनका नाम 'सीता' रखा गया। नि:संतान राजा जनक ने उस कन्या को भगवान का आशीर्वाद मानकर अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार कर लिया। इसी कारण उन्हें 'जनकपुत्री' और 'जानकी' के नाम से भी जाना जाता है। सीता नवमी का महत्व विवाहित महिलाएँ इस दिन व्रत रखती हैं और माता सीता की पूजा करती हैं। माना जाता है कि इससे वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। माता सीता को सहनशीलता, त्याग और पवित्रता का आदर्श माना जाता है। उनकी कथा हमें विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। कहा जाता है कि चैत्र नवमी को प्रभु श्रीराम का जन्म हुआ था और ठीक एक महीने बाद वैशाख नवमी को माता सीता का प्राकट्य हुआ। पूजा मंत्र: ॐ श्री सीतायै नमः

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