
Rama Devi Sahu
101 days ago
कुरुक्षेत्र का महायुद्ध अपने सबसे भयंकर चरण में पहुँच चुका था। कौरव सेना के सेनापति पितामह भीष्म अपराजेय प्रतीत हो रहे थे। उनके बाणों की वर्षा से पांडव सेना में हाहाकार मचा हुआ था। जहाँ भी भीष्म का रथ जाता, वहाँ पांडवों के वीर योद्धा धराशायी हो जाते। स्वयं अर्जुन भी अपने पितामह के सामने पूरी शक्ति से युद्ध नहीं कर पा रहे थे, क्योंकि उनके हृदय में भीष्म के प्रति गहरा सम्मान और प्रेम था। भगवान श्री कृष्ण यह सब देख रहे थे। वे जानते थे कि जब तक भीष्म युद्धभूमि में सक्रिय रहेंगे, तब तक पांडवों की विजय अत्यंत कठिन है। दूसरी ओर, भीष्म पितामह ने दुर्योधन को वचन दिया था कि वे पूरी शक्ति से कौरवों के लिए युद्ध करेंगे। उनका धर्म और प्रतिज्ञा उन्हें बाँधे हुए था। एक दिन युद्ध के बाद दुर्योधन क्रोधित होकर भीष्म के पास पहुँचा। उसने कटु वचन कहते हुए कहा— “पितामह! आप पूरी शक्ति से युद्ध नहीं कर रहे हैं। आपके हृदय में अभी भी पांडवों के लिए स्नेह है, इसी कारण वे जीवित हैं।” दुर्योधन की बात सुनकर भीष्म को बहुत दुःख हुआ। उन्होंने क्रोध और दृढ़ता से कहा— “दुर्योधन! कल मैं ऐसा युद्ध करूँगा कि या तो पांडव जीवित नहीं बचेंगे, या फिर भीष्म युद्धभूमि में नहीं रहेगा।” यह समाचार पांडव शिविर तक पहुँचा। सभी चिंतित हो उठे। यदि भीष्म ने सचमुच संकल्प कर लिया, तो अगले दिन भारी विनाश निश्चित था। युधिष्ठिर उदास थे, भीम क्रोधित थे, अर्जुन मौन थे। तब सबकी आशा केवल श्री कृष्ण पर टिकी। रात्रि का समय था। चारों ओर गहरा सन्नाटा छाया हुआ था। तभी श्री कृष्ण ने द्रौपदी को अपने पास बुलाया और कहा— “द्रौपदी, अभी मेरे साथ चलो।” द्रौपदी आश्चर्यचकित हुईं, परंतु उन्होंने बिना प्रश्न किए कृष्ण की आज्ञा स्वीकार कर ली। दोनों धीरे-धीरे कौरव शिविर की ओर बढ़े। कृष्ण ने द्रौपदी से कहा— “जब तुम भीष्म पितामह के पास जाओ, तो बिना कुछ बोले उनके चरण स्पर्श करना।” भीष्म पितामह उस समय अपने शिविर में ध्यानमग्न बैठे थे। द्रौपदी ने अंदर जाकर श्रद्धा से उनके चरण स्पर्श किए। भीष्म ने बिना ऊपर देखे सहज भाव से आशीर्वाद दिया— “अखंड सौभाग्यवती भव!” अर्थात — “तुम सदा सुहागन रहो।” जैसे ही उनके मुख से यह वचन निकला, उन्होंने सामने देखा। वहाँ द्रौपदी खड़ी थीं। एक क्षण के लिए भीष्म गंभीर हो गए। वे समझ गए कि उन्होंने क्या कह दिया है। यदि द्रौपदी सदा सुहागन रहेंगी, तो पाँचों पांडवों का जीवित रहना निश्चित है। लेकिन उन्होंने तो अगले दिन पांडवों के विनाश का संकल्प लिया था। भीष्म ने तुरंत समझ लिया कि यह साधारण घटना नहीं है। वे बाहर आए और देखा कि श्री कृष्ण मुस्कुराते हुए खड़े हैं। भीष्म folded hands करके बोले— “वासुदेव! आपकी लीला अद्भुत है। आपने मेरे ही मुख से पांडवों की रक्षा का वचन दिलवा दिया।” श्री कृष्ण मंद मुस्कान के साथ बोले— “पितामह, आपके आशीर्वाद कभी असत्य नहीं हो सकते। और मैं अपने भक्तों की रक्षा के लिए हर उपाय करता हूँ।” भीष्म कृष्ण की दिव्य चतुराई को समझ गए। वे जानते थे कि कृष्ण केवल एक सारथी नहीं, स्वयं परमात्मा हैं, जो धर्म की रक्षा के लिए लीला कर रहे हैं। अगले दिन युद्धभूमि में भीषण युद्ध हुआ। भीष्म ने पूरी शक्ति से युद्ध किया, लेकिन अंततः अर्जुन ने शिखंडी को आगे करके उन पर बाणों की वर्षा की। भीष्म बाणों की शय्या पर गिर पड़े। उन्होंने इच्छा-मृत्यु का वरदान होने के कारण तुरंत प्राण नहीं त्यागे और उत्तरायण आने तक शरशय्या पर ही रहे। यह प्रसंग केवल एक युद्धनीति नहीं, बल्कि कई गहरे संदेश देता है— भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिए अद्भुत उपाय करते हैं। संत और महापुरुषों के मुख से निकला आशीर्वाद कभी व्यर्थ नहीं जाता। धर्म और करुणा दोनों का संतुलन ही सच्चा जीवन है। श्री कृष्ण की बुद्धि, करुणा और लीला मानव समझ से परे है। द्रौपदी का विश्वास, भीष्म का सत्य और कृष्ण की लीला — ये तीनों मिलकर इस प्रसंग को महाभारत की सबसे भावपूर्ण घटनाओं में से एक बनाते हैं। #कृष्णा

Comments (0)
No comments yet. Be the first to comment!
