
Rama Devi Sahu
160 days ago
बहुत समय पहले एक विशाल राज्य में एक राजा रहता था। वह न केवल न्यायप्रिय और प्रजा-वत्सल था, बल्कि अत्यंत धार्मिक और ईश्वर-भक्त भी था। प्रतिदिन वह बड़े श्रद्धा-भाव से अपने इष्ट देव की पूजा किया करता था। उसकी दिनचर्या का सबसे पवित्र समय वही था जब वह ध्यान में बैठकर भगवान का स्मरण करता। एक दिन उसकी गहन भक्ति से प्रसन्न होकर इष्ट देव उसके सामने प्रकट हो गए। भगवान बोले— “राजन, मैं तुम्हारी भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हूँ। यदि तुम्हारी कोई इच्छा हो तो बताओ, मैं उसे अवश्य पूर्ण करूँगा।” राजा विनम्र होकर बोला— “भगवन! आपके आशीर्वाद से मेरे राज्य में सुख-शांति है, मुझे किसी वस्तु की कमी नहीं। परंतु एक इच्छा है—आपने मुझे दर्शन देकर धन्य किया, ऐसा ही मेरी प्रजा को भी सौभाग्य प्राप्त हो। कृपया उन्हें भी दर्शन दें।” भगवान मुस्कुराए— “रजन! यह संभव नहीं। हर व्यक्ति अपनी योग्यता और भक्ति के अनुसार ही मेरे दर्शन पा सकता है। तुम्हारी सारी प्रजा का यह सौभाग्य नहीं हो सकता।” लेकिन राजा अपनी प्रजा के लिए दृढ़ हो गया। उसने भगवान से विनती की— “भगवन! वे सभी आपके बच्चे हैं। कृपा करके उन्हें भी यह परम सौभाग्य दें।” राजा की अटल भावना देखकर भगवान को झुकना पड़ा। वे बोले— “ठीक है। कल अपनी पूरी प्रजा को उस विशाल पहाड़ी के नीचे लेकर आना। मैं पहाड़ी के शीर्ष से उन्हें दर्शन दूँगा।” अगले दिन राजा ने ढिंढोरा पिटवा दिया कि कल समस्त प्रजा भगवान के दर्शन के लिए पहाड़ी पर एकत्र हो। दूसरे दिन विशाल जनसमूह उत्साह और श्रद्धा से भरा राजा के पीछे-पीछे चल पड़ा। रास्ते में सबसे पहले ताँबे के सिक्कों का एक बड़ा पहाड़ दिखा। उसे देखते ही कई लोग लालच से उस ओर दौड़ पड़े। राजा ने उन्हें चेताया— “भाइयो! तुम भगवान के दर्शन के लिए जा रहे हो। इन ताँबे के सिक्कों के लोभ में मत पड़ो।” परंतु कुछ लोगों ने राजा की बात पर ध्यान नहीं दिया। वे मन में सोचने लगे— “पहले यह धन तो ले लें। भगवान तो फिर कभी मिल ही जाएँगे।” राजा दुखी मन से आगे बढ़ता रहा। थोड़ी दूरी पर चाँदी के सिक्कों का चमकता हुआ पहाड़ मिला। इस बार भी बचे हुए कुछ लोग चाँदी समेटने में लग गए और वहीं से घर लौटने लगे। उनका विचार था— “ऐसा अवसर बार-बार नहीं मिलता, भगवान से बाद में भी मिला जा सकता है।” राजा के मन का बोझ और बढ़ गया। कुछ दूर आगे चलने पर सोने के सिक्कों का पहाड़ दिखाई दिया। इस बार तो राजा के अपने स्वजन भी प्रलोभन में पड़ गए और सोना बटोरकर खुशी-खुशी लौट पड़े। अब राजा के साथ केवल रानी रह गई थी। राजा बोला— “देखो रानी, लोग भगवान के दर्शनों से अधिक इन क्षणिक धन-संपत्तियों का मोह रखते हैं।” रानी ने सहमति जताई, परंतु जैसे ही आगे हीरों की चमक से दमकता पहाड़ दिखाई दिया, रानी भी मोहग्रस्त हो गई। वह दौड़ती हुई गई और हीरे बटोरने लगी। उसने अपनी सारी सीमा भूलकर उन्हें साड़ी में बाँधना भी शुरू कर दिया। अंततः उसके वस्त्र भी गिर पड़े, परंतु उसके लोभ की आग शांत न हुई। यह दृश्य देख राजा का हृदय टूट गया। वह अकेला आगे बढ़ा। पहाड़ी के शिखर पर इष्ट देव स्वयं खड़े प्रतीक्षा कर रहे थे। राजा को देखते ही भगवान बोले— “राजन, कहाँ है तुम्हारी प्रजा और तुम्हारे स्वजन? मैं तो उनके लिए इंतजार कर रहा था।” राजा ने शर्म से सिर झुका लिया। तब भगवान ने समझाया— “जो लोग भौतिक वस्तुओं को मुझसे अधिक महत्व देते हैं, उन्हें मेरी प्राप्ति नहीं हो सकती। जो मन, बुद्धि और प्रेम से मुझे सर्वोपरि मानते हैं, वही मेरे प्रिय बनते हैं।” यह सुनकर राजा के हृदय में गहरी समझ और वैराग्य जाग उठा। उसे ज्ञात हुआ कि ईश्वर की राह पर लोभ और मोह सबसे बड़ी बाधाएँ हैं।
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