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जय श्री महाकाल 🙏 1. इतिहास - एक बार पूरी तरह मिटा दिया गया था - *प्राचीन मंदिर:* कहा जाता है महाकाल मंदिर परम प्रतापी राजा विक्रमादित्य ने बनवाया था। - *विध्वंस:* 1235 में दिल्ली के सुल्तान *इल्तुतमिश* ने उज्जैन पर हमला किया। उसने मंदिर को पूरी तरह तोड़ दिया, मुख्य स्वयंभू ज्योतिर्लिंग को खंडित करके पास के *कोटि तीर्थ कुंड* (बावड़ी) में फेंक दिया और जलधारी लूट ली। - *पुनर्जन्म:* लगभग 500 साल तक वो खंडहर ही पड़ा रहा। फिर 18वीं शताब्दी में *पेशवा बाजीराव प्रथम* के शासन में उनके सेनापति *राणोजी सिंधिया* के दीवान *रामचंद्र बाबा शिंदे* ने इसे फिर से बनवाया। यही मंदिर आज हम देख रहे हैं, जो Basalt और Sandstone से बना है। 2. मंदिर की इंजीनियरिंग - 5 मंजिलों का रहस्य ये मंदिर एक सीधी इमारत नहीं, बल्कि 5 लेवल का एक आध्यात्मिक टावर है - *लेवल 1 - सबसे नीचे: श्री महाकालेश्वर गर्भगृह* ये जमीन से काफी नीचे है। यहाँ मुख्य स्वयंभू लिंग है, जो एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। *लेवल 2: ओंकारेश्वर शिवलिंग* गर्भगृह के ठीक ऊपर। कहा जाता है जो महाकाल के दर्शन करता है, उसे ओंकारेश्वर के भी दर्शन करने चाहिए तभी यात्रा पूरी होती है। *लेवल 3: नागचंद्रेश्वर मंदिर* ये पूरे भारत में इकलौता ऐसा मंदिर है जो साल में सिर्फ एक बार - *नागपंचमी* पर 24 घंटे के लिए खुलता है। यहाँ भगवान शिव अपने परिवार के साथ नाग शैय्या पर विराजमान हैं। 11वीं सदी की ये मूर्ति नेपाल से लाई गई थी। *लेवल 4: नंदी हॉल* यहाँ विशाल नंदी जी बैठे हैं, जो सीधे महाकाल को निहारते रहते हैं। *लेवल 5: विशाल शिखर* लगभग 78 फीट ऊँचा। ये मंदिर *भूमिज, चालुक्य और मराठा* तीनों शैलियों का संगम है, इसलिए ये इतना अनोखा दिखता है। 3. ये दक्षिण मुखी ही क्यों है? - सबसे बड़ा रहस्य 12 ज्योतिर्लिंगों में सिर्फ महाकाल ही दक्षिण मुखी हैं। ये कोई गलती नहीं, जानबूझकर किया गया डिज़ाइन है। हिन्दू शास्त्रों में दक्षिण दिशा *यमराज - मृत्यु के देवता* की दिशा मानी जाती है। महाकाल का अर्थ ही है - जो काल (मृत्यु) का भी काल है। दक्षिण की तरफ मुख करके बैठना इस बात का प्रतीक है कि - *महाकाल ही समय और मृत्यु के स्वामी हैं, और वो ही मृत्यु की दिशा से आने वाली नकारात्मक ऊर्जा को रोक सकते हैं।* इसीलिए उज्जैन को तंत्र-मंत्र और काल पर विजय पाने की नगरी भी कहा जाता है। *1. भस्म आरती - क्यों राख से होता है श्रृंगार?* दुनिया में कहीं भी शिव जी को राख से नहीं सजाया जाता, सिर्फ महाकाल को। रोज सुबह 4 बजे श्मशान की ताजी भस्म से उनका श्रृंगार होता है। इसका संदेश है - जिस शरीर पर हम घमंड करते हैं, उसका आखिर राख ही होना है, इसलिए अहंकार छोड़ो। पहले ये भस्म श्मशान से ही आती थी, अब गोबर के कंडे की भस्म से बनाई जाती है। इस आरती को देखने के लिए रात 12 बजे से लाइन लगती है। *2. यहाँ भगवान के साथ-साथ शक्ति भी हैं* एक-दो सेकंड के लिए देवी माँ का मंदिर भी दिखा। उज्जैन में ही *हरसिद्धि माता मंदिर* है, जो 51 शक्तिपीठों में से एक है। कहा जाता है यहाँ माता सती की कोहनी गिरी थी। इसलिए उज्जैन एकमात्र ऐसी जगह है जहाँ *ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ* दोनों साथ-साथ हैं। शिव और शक्ति एक साथ। *3. उज्जैन समय का केंद्र क्यों है?* ध्यान दीजिए - मंदिर *क्षिप्रा नदी के किनारे* है और कर्क रेखा (Tropic of Cancer) ठीक उज्जैन से गुजरती है। प्राचीन भारतीय ज्योतिषियों ने उज्जैन को पृथ्वी का मध्य बिंदु (ग्रीनविच ऑफ इंडिया) माना था। इसलिए आज भी पूरा पंचांग, सारे मुहूर्त उज्जैन के समय से ही निकाले जाते हैं। महाकाल को इसी लिए *महाकालेश्वर - समय का ईश्वर* कहा जाता है।

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