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*🙏🪷 सियाश्रित 🪷🙏* चौपाई : *मंदिर माझ भई नभबानी। रे हतभाग्य अग्य अभिमानी॥* *जद्यपि तव गुर के नहिं क्रोधा। अति कृपाल चित सम्यक बोधा॥1॥* भावार्थ:-मंदिर में आकाशवाणी हुई कि अरे हतभाग्य! मूर्ख! अभिमानी! यद्यपि तेरे गुरु को क्रोध नहीं है, वे अत्यंत कृपालु चित्त के हैं और उन्हें (पूर्ण तथा) यथार्थ ज्ञान है,॥1॥ *तदपि साप सठ दैहउँ तोही। नीति बिरोध सोहाइ न मोही॥* *जौं नहिं दंड करौं खल तोरा। भ्रष्ट होइ श्रुतिमारग मोरा॥2॥* भावार्थ:-तो भी हे मूर्ख! तुझको मैं शाप दूँगा, (क्योंकि) नीति का विरोध मुझे अच्छा नहीं लगता। अरे दुष्ट! यदि मैं तुझे दण्ड न दूँ, तो मेरा वेदमार्ग ही भ्रष्ट हो जाए॥2॥ *जे सठ गुर सन इरिषा करहीं। रौरव नरक कोटि जुग परहीं॥* *त्रिजग जोनि पुनि धरहिं सरीरा। अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा॥3॥* भावार्थ:-जो मूर्ख गुरु से ईर्षा करते हैं, वे करोड़ों युगों तक रौरव नरक में पड़े रहते हैं। फिर (वहाँ से निकलकर) वे तिर्यक्‌ (पशु, पक्षी आदि) योनियों में शरीर धारण करते हैं और दस हजार जन्मों तक दुःख पाते रहते हैं॥3॥ *बैठि रहेसि अजगर इव पापी। सर्प होहि खल मल मति ब्यापी॥* *महा बिटप कोटर महुँ जाई। रहु अधमाधम अधगति पाई॥4॥* भावार्थ:-अरे पापी! तू गुरु के सामने अजगर की भाँति बैठा रहा। रे दुष्ट! तेरी बुद्धि पाप से ढँक गई है, (अतः) तू सर्प हो जा और अरे अधम से भी अधम! इस अधोगति (सर्प की नीची योनि) को पाकर किसी बड़े भारी पेड़ के खोखले में जाकर रह॥4॥ दोहा : *हाहाकार कीन्ह गुर दारुन सुनि सिव साप।* *कंपित मोहि बिलोकि अति उर उपजा परिताप॥107 क॥* भावार्थ:-शिवजी का भयानक शाप सुनकर गुरुजी ने हाहाकार किया। मुझे काँपता हुआ देखकर उनके हृदय में बड़ा संताप उत्पन्न हुआ॥107 (क)॥ *करि दंडवत सप्रेम द्विज सिव सन्मुख कर जोरि।* *बिनय करत गदगद स्वर समुझि घोर गति मोरि॥107 ख॥* भावार्थ:-प्रेम सहित दण्डवत्‌ करके वे ब्राह्मण श्री शिवजी के सामने हाथ जोड़कर मेरी भयंकर गति (दण्ड) का विचार कर गदगद वाणी से विनती करने लगे-॥107 (ख)॥ *🙏🪷 उत्तर काण्ड 🪷🙏* *🌹 जय सियाराम जय राधेश्याम 🌹* *🙏 पार्वती शिव जय हनुमान 🙏* *🙏🌹 ॐ श्री सद्गुरवे नमः 🌹🙏* *सीता राम राम राम सीता राम राम राम* *सीता राम राम राम सीता राम राम राम* *🙏 🪷 जय जय सियाराम 🪷 🙏*

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