
बद्रीप्रसादअसाटी
293 days ago
जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥ निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना॥

Comments (0)
No comments yet. Be the first to comment!

50 लाख से भी ज़्यादा हिंदुओं का सबसे प्रिय एप्प
Get it on Google Play
293 days ago
जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥ निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना॥

No comments yet. Be the first to comment!