
Rama Devi Sahu
3 days ago
“जिस दिन स्वयं भगवान ने जन्म लिया, उस दिन भोजन क्यों छोड़ा जाता है? क्या जन्माष्टमी का उपवास केवल भूखे रहने का नाम है… या इसके पीछे छिपा है मनुष्य के भीतर ‘कृष्ण’ के जन्म का एक दिव्य रहस्य?” 🦚✨ 🦚 जन्माष्टमी का उपवास क्यों? जिस दिन कृष्ण जन्मे, उस दिन अन्न नहीं—अहंकार छोड़ने की परंपरा है! कल जन्माष्टमी है… वह पावन रात्रि, जब अंधकार से भरी कारागार की कोठरी में अखिल ब्रह्मांड के नायक भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था। 🌸 यह केवल किसी देवता के जन्म का उत्सव नहीं है। यह उस दिव्य क्षण का स्मरण है, जब अधर्म के बढ़ते अंधकार के बीच धर्म ने जन्म लिया, जब भय के बीच आशा ने जन्म लिया और जब अत्याचार के बीच प्रेम ने जन्म लिया। लेकिन एक प्रश्न मन में उठता है— जब जन्माष्टमी भगवान के जन्म की खुशी का उत्सव है, तो भक्त इस दिन उपवास क्यों रखते हैं? क्या भगवान श्रीकृष्ण को हमारी भूख चाहिए? नहीं… भगवान को भूखा शरीर नहीं, जागा हुआ मन चाहिए। 🌿 उपवास का अर्थ केवल “भोजन न करना” नहीं हम अक्सर उपवास को केवल अन्न त्यागने के रूप में देखते हैं। लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से “उपवास” का एक सुंदर भाव है— उप + वास = परमात्मा के समीप वास। अर्थात इस दिन केवल पेट को खाली करना उद्देश्य नहीं है, बल्कि अपने भीतर भगवान के लिए स्थान बनाना उद्देश्य है। दिनभर इंद्रियों को संयमित करके, मन को सांसारिक भागदौड़ से हटाकर, कथा, नाम-स्मरण, भजन और ध्यान में लगाना ही उपवास की आत्मा है। इसलिए जन्माष्टमी का व्रत हमें सिखाता है— “आज केवल भोजन से दूरी नहीं, अपने भीतर के विकारों से भी दूरी बनाओ।” काम से दूरी… क्रोध से दूरी… लोभ से दूरी… अहंकार से दूरी… ईर्ष्या से दूरी… और सबसे बढ़कर— अपने भीतर के उस अंधकार से दूरी, जिसमें कृष्ण का प्रकाश अभी जन्म लेना बाकी है। 🌺 कृष्ण का जन्म बाहर नहीं, भीतर भी होना चाहिए श्रीकृष्ण का जन्म कारागार में हुआ था। चारों ओर पहरेदार थे। देवकी और वसुदेव बंधन में थे। कंस का आतंक था। रात्रि का घोर अंधकार था। फिर भी उसी अंधकार के बीच प्रकाश आया। यही जन्माष्टमी का सबसे बड़ा संदेश है। परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, जब मनुष्य के भीतर धर्म, सत्य और प्रेम का जन्म होता है, तब जीवन का अंधकार मिटने लगता है। हमारे भीतर भी एक “कारागार” है— कभी भय का, कभी चिंता का, कभी क्रोध का, कभी अहंकार का, कभी मोह का। और उस कारागार में हमारा मन कैद रहता है। जन्माष्टमी हमें पुकारकर कहती है— “अपने भीतर ऐसा वातावरण बनाओ कि वहां भी कृष्ण का जन्म हो सके।” 🕉️ फिर आधी रात को ही क्यों मनाया जाता है जन्म? श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की मध्यरात्रि में माना जाता है। यह भी अपने आप में एक गहरा आध्यात्मिक संकेत देता है। जब रात सबसे गहरी होती है, तभी प्रभु के आगमन की प्रतीक्षा की जाती है। मानो संदेश दिया जा रहा हो— जब जीवन का अंधकार अपने चरम पर पहुंच जाए, तब भी उम्मीद मत छोड़ना। क्योंकि संभव है… जिस अंधकार को तुम अंत समझ रहे हो, उसी के बाद तुम्हारे जीवन में किसी नए प्रकाश का जन्म होने वाला हो। 🌸 उपवास हमें क्या सिखाता है? उपवास का वास्तविक उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि इंद्रियों पर संयम और मन को भगवान की ओर लगाना है। इस दिन भक्त अपनी क्षमता और परंपरा के अनुसार व्रत रखते हैं, भगवान का स्मरण करते हैं, श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं को याद करते हैं और मध्यरात्रि में उनके जन्मोत्सव में सहभागी बनते हैं। लेकिन यदि कोई व्यक्ति स्वास्थ्य कारणों से व्रत नहीं रख सकता, तो उसे स्वयं को दोषी समझने की आवश्यकता नहीं। कृष्ण भाव देखते हैं, केवल उपवास नहीं। किसी भूखे व्यक्ति को भोजन करा देना भी कृष्ण-भक्ति है। किसी दुखी व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान ला देना भी कृष्ण-भक्ति है। किसी से क्षमा मांग लेना भी कृष्ण-भक्ति है। किसी के प्रति मन से द्वेष छोड़ देना भी कृष्ण-भक्ति है। और अपने कर्मों में ईमानदारी रखना भी कृष्ण-भक्ति है। 🦚 इस जन्माष्टमी एक संकल्प जरूर लें इस बार जब आप कृष्ण जन्म का उत्सव मनाएं, तो केवल घर में दीपक न जलाएं… अपने भीतर भी एक दीपक जलाएं। जिस मन में क्रोध अधिक है, वहां थोड़ा प्रेम जन्म लेने दें। जिस मन में अहंकार है, वहां विनम्रता जन्म लेने दें। जिस मन में भय है, वहां विश्वास जन्म लेने दें। जिस मन में निराशा है, वहां आशा जन्म लेने दें। और जिस जीवन में परेशानियां हैं, वहां श्रीकृष्ण के उस संदेश को याद करें— “कर्म करते रहो, परिणाम की चिंता मुझे सौंप दो।” क्योंकि कृष्ण क
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