
Rama Devi Sahu
23 days ago
आईए आज दुखों की कुछ विवेचना करें ।। जीवों के कष्ट के प्रमुख कारण क्या हैं ? संस्कृत में कष्ट अथवा दुख को ताप भी कहा जाता है, वेदों के अनुसार भी इस सृष्टि में प्रत्येक जीव दुखी है ।। इस संसार के सभी जीव तीन प्रकार के तापों से तप रहे हैं जिन्हें त्रिविध ताप कहा जाता है- 1. आध्यात्मिक ताप 2. आधिभौतिक ताप 3. आधिदैविक ताप यही तीनों ताप माया के अधीन रहकर प्रत्येक मनुष्य को दुख देते रहते हैं ।। 1.आध्यात्मिक ताप - इन तीनों में से सबसे प्रमुख आध्यात्मिक ताप है जिसे दैहिक ताप भी कहते हैं ।। मनुष्य शरीर को स्वत: अपने ही कर्म से जो कष्ट होता है उसे दैहिक अथवा आध्यात्मिक ताप कहा जाता है ।। इसमें हमारे आत्म को व्याधि, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, घृणा, ईर्ष्या, द्वेष भय आदि से प्रबल कष्ट होता है ।। आध्यात्मिक दुख भी दो प्रकार के होते हैं- 1. शारीरिक ताप 2. मानसिक ताप शारीरिक ताप शरीर में विभिन्न व्याधियां हैं जो आती जाती रहती हैं परंतु मानसिक ताप बेहद कष्टदाई होता है, यह आजीवन हमारा पीछा नहीं छोड़ता है ।। ऊपर बताएं दसों विकार हमारे मन में चिंताओं को जन्म देते हैं, इनमें से भी तीन विकार प्रमुख है काम, क्रोध और लोभ और इनमें से भी सबसे प्रमुख काम है यानी इच्छाएं जो प्रत्येक दुख की जननी हैं ।। इन समस्त दुखों का कारण मनुष्य की अज्ञानता है जिसने अपने वास्तविक स्वरूप को भुला दिया है ।। 2. आधिभौतिक ताप - किसी दूसरे प्राणी के निर्णय अथवा कार्यों के कारण होने वाले कष्ट को भौतिक या आधिभौतिक ताप कहते हैं, जैसे आप यात्रा पर निकले और किसी दूसरे व्यक्ति की भूल से आप दुर्घटना का शिकार बन जाएं, या किसी दूसरे व्यक्ति के झूठ को सत्य मान कर आपको कष्ट भोगना पड़े, या किसी अभिन्न मित्र या परिजन द्वारा आपको छला जाए, यह सभी कष्ट आधिभौतिक ताप है ।। 3. आधिदैविक ताप - जो कष्ट हमें प्रकृति से प्राप्त होते हैं यानी प्रकृति जन्य है वह आधिदैविक ताप की श्रेणी में आते हैं जैसे भूकंप, बाढ़, चक्रवात इत्यादि से पीड़ित हो जाना ।। इन्हीं तीनों तापों के चलते जीव चिता में जाने तक चिंता मुक्त नहीं हो पाता ।। इन्हीं तीनों तापों के प्रभाव से बचने के लिए हर मनुष्य गुरु खोजता है और उनकी शरण में जाता है, जिनकी वाणी, ज्ञान और अनुभव से मनुष्य अपने अस्तित्व को समझने लगता है और अपने विकारों को छोड़कर विचारवान एवं संयमी बनता है ।। ज्यादातर लोग अपने स्वार्थ को पूर्ण करने के लिए ही सत्संग, मंदिर अथवा गुरु की शरण में जाते हैं, निस्वार्थ रूप से कोई ईश्वर या गुरु के पास नहीं जाता है ।। दुखों में डूबे हुए मनुष्य इनके निवारण के लिए ही ईश्वर या गुरु को याद करते हैं, बहुत कम लोग हैं जो स्वयं को जानने और पहचानने के लिए ईश्वर या गुरु की शरण में जाते हैं ।। जब एक सामाजिक मनुष्य के हृदय में खुद को जानने की तीव्र इच्छा जागृत होती है तभी परमेश्वर स्वरूप सद्गुरु उसके जीवन में प्रवेश करते हैं, उन्हें कहीं ढूंढना नहीं पड़ता ।। सद्गुरु वही हैं जो आपकी देह में पहले से ही विराजमान आपके आत्म गुरु से आपका परिचय करा दें ताकि आप इन तापों द्वारा प्रभावित हुए बिना अपना जीवन एक जागृत उन्मुक्त जीव की भांति जी सकें ।।
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