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#कुण्डली_में_चंद्रमा_किस_अंश_पर_है? यही तय कर सकता है आपके मन और भाग्य की दिशा!” “चंद्रमा के 30 अंशों का रहस्य: कौन-सा अंश देता है शक्ति और कौन-सा बनाता है मन कमजोर?” “सिर्फ चंद्र राशि देखना पर्याप्त नहीं! 🌙 चंद्रमा के अंश में छिपा है असली ज्योतिषीय रहस्य” “0° से 30° तक चंद्रमा की रहस्यमयी यात्रा—हर 6° पर बदल जाती है ग्रह की अवस्था!” “क्या आपकी #कुण्डली का चंद्रमा युवा अवस्था में है? जानिए उसके अंश का गूढ़ प्रभाव!” वैदिक ज्योतिष में #चंद्रमा मन, माता, जल, भावनाएँ, स्मृति तथा मानसिक स्थिरता का प्रधान कारक है। ऋग्वेद में “चन्द्रमा मनसो जातः” कहा गया है, जो उसके मन से प्रत्यक्ष संबंध को स्पष्ट करता है। सूर्यसिद्धान्त के गणितीय आधार पर चंद्रमा की औसत दैनिक गति लगभग 13°10' से 13°20' के आसपास मानी जाती है, जिससे वह लगभग ढाई दिन में एक राशि तथा लगभग 27.3 दिनों में नक्षत्र-मंडल का भ्रमण पूरा करता है। यही खगोलीय गणना ज्योतिषीय #कुण्डली_निर्माण का मूल है।ग्रह की शक्ति (बल) एवं अवस्था (अवस्था) का निर्धारण उसकी राशि में डिग्री-स्थिति, पक्ष, दिशा तथा अन्य कारकों से होता है। #बृहत्पाराशर होराशास्त्र में बालादि अवस्था का स्पष्ट वर्णन है। प्रत्येक राशि 30° की होती है। इसे पाँच समान भागों (प्रत्येक 6°) में बाँटा जाता है। विषम राशियों (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुम्भ) में क्रम आगे बढ़ता है, जबकि सम राशियों (वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन) में क्रम उलटा होता है। #बालादि अवस्था का सटीक क्रमविषम राशि में:0° से 6° — बालावस्था (शिशु) — बल लगभग एक-चौथाई6° से 12° — कुमारावस्था (किशोर) — बल लगभग आधा12° से 18° — युवावस्था (युवा) — पूर्ण बल18° से 24° — वृद्धावस्था (वृद्ध) — अल्प बल24° से 30° — मृतावस्था (मृत) — नगण्य या शून्य बलसम राशि में क्रम विपरीत होता है: 0°–6° मृतावस्था, 6°–12° वृद्धावस्था, 12°–18° युवावस्था (यहाँ भी पूर्ण), 18°–24° कुमारावस्था तथा 24°–30° बालावस्था। #युवावस्था (12°–18°) दोनों प्रकार की राशियों में पूर्ण फलदायी रहती है। यह अवस्था ग्रह की परिपक्वता तथा फल-प्रदान की क्षमता दर्शाती है। #युवावस्था में चंद्रमा मानसिक स्थिरता, भावनात्मक परिपक्वता तथा माता-संबंधी सुख को पूर्ण रूप से व्यक्त करता है; मृतावस्था में वही चंद्रमा अस्थिरता, चंचलता या मानसिक दुर्बलता उत्पन्न कर सकता है। षड्बल के प्रमुख अंग तथा चंद्रमास्थान बल में चंद्रमा सम राशि में अधिक बली माना जाता है। #दिग्बल में चंद्रमा को चतुर्थ भाव (उत्तर दिशा) में पूर्ण बल प्राप्त होता है। बृहत्पाराशर होराशास्त्र तथा अन्य शास्त्रों में स्पष्ट है कि शुक्र एवं चंद्रमा चतुर्थ भाव में दिग्बली होते हैं। कालबल में रात्रि-जन्म में चंद्रमा विशेष रूप से बलवान होता है। पक्षबल सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। शुक्ल पक्ष (प्रतिपदा से पूर्णिमा तक) में चंद्रमा बढ़ते हुए प्रकाश के कारण पूर्ण बलवान होता है; कृष्ण पक्ष में प्रकाश घटने के साथ बल क्रमशः क्षीण होता जाता है। चंद्रमा की डिग्री #पूर्णिमा के निकट चंद्रमा सर्वाधिक शक्तिशाली तथा अमावस्या के निकट सबसे दुर्बल माना जाता है। सूर्यसिद्धान्त की गणना से चंद्रमा की स्फुट गति तथा सूर्य से कोणीय दूरी पक्ष-निर्धारण का आधार बनती है।उच्च स्थान वृषभ 3° पर तथा नीच स्थान वृश्चिक 3° पर है। स्वराशि कर्क में चंद्रमा स्वाभाविक रूप से स्थिर एवं पोषक प्रभाव देता है।प्रत्येक भाव में चंद्रमा का प्रभाव (डिग्री एवं बल के साथ)भाव-फल सदैव राशि, नक्षत्र, पक्षबल, युति-दृष्टि तथा #षड्बल के साथ संयुक्त रूप से देखा जाता है। शुद्ध रूप में भाव-स्थित चंद्रमा का सामान्य प्रभाव इस प्रकार है। चंद्रमा की शक्ति लग्न (प्रथम भाव) में चंद्रमा व्यक्ति को भावुक, आकर्षक, माता के गुणों से युक्त तथा मानसिक रूप से संवेदनशील बनाता है। युवावस्था तथा शुक्ल पक्ष में यह बलवान शरीर, दीर्घायु तथा लोकप्रियता देता है। बाला या #मृतावस्था में चंचलता तथा शीघ्र थकान की प्रवृत्ति बढ़ सकती है। द्वितीय भाव में चंद्रमा वाणी को मधुर, परिवार तथा धन-संबंधी भावनाओं को गहरा बनाता है। बलवान होने पर सुंदर वाणी तथा पारिवारिक सुख; दुर्बल होने पर वाणी में अस्थिरता या नेत्र-संबंधी कष्ट संभव है। तृतीय भाव में चंद्रमा साहस, छोटे भाई-बहन तथा संचार-शक्ति को प्रभावित करता है। यहाँ चंद्रमा सक्रिय मन तथा लेखन-कल

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