MyMandirInstall
Profile

Rama Devi Sahu

35 days ago

।। कृष्ण कथा ।। एक दिन भगवान श्रीकृष्ण भोजन करने बैठे थे। अभी उन्होंने मुश्किल से एक-दो ग्रास ही ग्रहण किए थे कि अचानक वे उठ खड़े हुए। उनके मुख पर गहरी व्याकुलता थी। वे तेज़ी से महल के द्वार की ओर दौड़े, लेकिन कुछ ही क्षण बाद शांत और उदास भाव से लौट आए तथा पुनः भोजन करने लगे। यह देखकर रुक्मिणी जी आश्चर्यचकित हो गईं। उन्होंने विनम्रता से पूछा, "प्रभु! आप इतनी शीघ्रता से बाहर क्यों गए, और फिर इतने उदास होकर वापस क्यों लौट आए?" श्रीकृष्ण मुस्कुराए और बोले, "मेरा एक भक्त राजधानी से होकर गुजर रहा था। वह एकतारा बजाते हुए प्रेम और भक्ति में डूबकर मेरा नाम गा रहा था। लोग उसे पागल समझकर उसका उपहास कर रहे थे, उस पर पत्थर बरसा रहे थे। उसके माथे से रक्त बह रहा था। उसे उस अवस्था में देखकर मैं उसकी रक्षा के लिए तुरंत दौड़ पड़ा।" रुक्मिणी जी ने फिर पूछा, "तो फिर आप उसकी सहायता किए बिना लौट क्यों आए?" भगवान श्रीकृष्ण ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया, "मैं अभी द्वार तक ही पहुँचा था कि उसने अपना एकतारा नीचे रख दिया और स्वयं पत्थर उठाकर प्रतिकार करने के लिए तैयार हो गया। जब उसने अपनी रक्षा का भार स्वयं उठा लिया, तब मुझे लगा कि अब उसे मेरी सहायता की आवश्यकता नहीं रही। यदि वह कुछ क्षण और धैर्य रखता और मुझ पर पूर्ण विश्वास बनाए रखता, तो मैं अवश्य उसकी रक्षा करता।" यह प्रसंग हमें यह शिक्षा देता है कि जीवन की कठिनाइयों में भगवान हमारी परीक्षा अवश्य लेते हैं, पर कभी हमारा साथ नहीं छोड़ते। अक्सर हम अधीर होकर विश्वास खो बैठते हैं। सच्ची भक्ति वही है, जिसमें परिस्थितियाँ कैसी भी हों, प्रभु पर अटल श्रद्धा और धैर्य बना रहे। RADHE RADHE JAI SHREE KRISHNA JI

Post media

Comments (0)

No comments yet. Be the first to comment!