MyMandirInstall
Profile

Rama Devi Sahu

287 days ago

|| जय श्री राधा माधव || आज के दौर में बच्चे उम्र के साथ आने वाली परिपक्वता से पहले ही वयस्कों की तरह सोचने और व्यवहार करने लगे हैं। लेकिन यह समझ वास्तविक अनुभव पर आधारित नहीं होती, बल्कि सतही ज्ञान, सोशल मीडिया, अधूरी जानकारी और तर्क-वितर्क की आदत पर आधारित होती है। “बच्चे अब समय से पहले सयाने होने लगे हैं, कुतर्कों के माध्यम से बड़ों को सिखाने लगे हैं।” इसी कारण वे बड़ों को समझाने या गलत साबित करने के लिए कई बार कुतर्क— यानी गलत, अधूरे या भ्रमित तर्क—का सहारा लेते हैं। यह स्थिति यह संकेत देती है कि बच्चों में विवेक की जगह प्रश्न और विरोध की प्रवृत्ति बढ़ रही है, और अनुशासन व आदर जैसे मूल्य कमजोर पड़ रहे हैं। जहाँ पहले बच्चे बड़े-बुजुर्गों से सीखते थे, वहीं अब वे तकनीक और बाहरी प्रभावों से प्रेरित होकर अपने को अधिक ज्ञानी समझने लगे हैं। लेकिन वास्तविक समझ न होने के कारण वे तर्क नहीं, कुतर्क करते हैं, और इस प्रक्रिया में न केवल स्वयं भ्रमित होते हैं, बल्कि पारिवारिक और सामाजिक सम्मान की मर्यादाएँ भी प्रभावित होती हैं। || श्री हरि शरणम् || ईश्वर सत्य ll

Post media

Comments (4)

Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

Nov 16, 2025

Radhey Radhey ❤️ Jai Shree Krishna 🙏🌹🌹

Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

Nov 16, 2025

Wow...!!! Ji, Dhanyawad 🙏 Bahut hi Sundar Sujhaav 👌👌 Sahi kaha, Gyan se Adhik Sanskar Jaruri hai....!!!! 🙏🙏

My Mandir  good by

My Mandir good by

Nov 16, 2025

🪷 ✨ कहानी: “ज्ञान का भ्रम और एक दीपक का सच” एक गाँव में आर्यन नाम का एक लड़का रहता था। पढ़ाई में तेज, मोबाइल और इंटरनेट का अच्छा जानकार। वह सोचता था— “दादाजी की बातें पुरानी हैं, दुनिया बदल गई है… अब तकनीक ही असली गुरु है।” घर में कोई भी बात होती, तो आर्यन मोबाइल निकालकर कहता— “देखो, गूगल पर यह लिखा है!” धीरे-धीरे वह बड़ों की बात काटने लगा, उनके अनुभव को तुच्छ समझने लगा, और हर बात पर कुतर्क करने लगा। घर में सबको दुख होता, पर दादाजी चुप थे। वह आर्यन को शिक्षा देना चाहते थे, लेकिन आधुनिकता से भिड़ना नहीं चाहते थे। एक दिन गाँव में बिजली चली गई। सबके मोबाइल बंद हो गए, इंटरनेट खत्म, स्क्रीन काली। आर्यन बेचैन होकर बोला: “मेरे पास कुछ नहीं है! मैं कुछ कर नहीं सकता!” दादाजी धीरे से बोले— “आओ, कुछ सीखो।” उन्होंने तेल का दीपक जलाया, और बोला: “इस दीपक को देखो— यह बिना स्क्रीन के रोशनी देता है, बिना इंटरनेट के दिशा दिखाता है।” आर्यन बोला— “लेकिन दीपक पुराना तरीका है दादाजी। हम इस जमाने में मोबाइल से सब कर लेते हैं।” दादाजी मुस्कुराए: “सही कहा। मोबाइल जानकारी दे सकता है, पर प्रकाश नहीं।” “सिर्फ़ ज्ञान होना काफी नहीं, समझ होना जरूरी है।” “तकनीक हाथ में दे सकती है, पर समझ हृदय में ही जगती है।” आर्यन कुछ देर तक चुप रहा। दादाजी ने आगे कहा— “याद रखो, बड़ों का अनुभव तुम्हारे तेज़ दिमाग की दिशा बन सकता है।” “गलत जगह इस्तेमाल किया ज्ञान — कुतर्क बन जाता है। और सही जगह लगाया तो संस्कार।” आर्यन की आँखों में रोशनी उतर आई। वह चुपचाप दादाजी के पास बैठ गया, और बोला: “आज पहली बार समझा… ज्ञान स्मार्टफोन में नहीं, संस्कारों में छुपा है।” --- 🌸 कहानी का सार: 👉 जानकारी होना ठीक है, लेकिन विनम्रता और विवेक होना आवश्यक है। 👉 तकनीक सही दिशा में तभी काम करती है, जब संस्कार और मर्यादा साथ हों। 👉 बड़ों का अनुभव, जीवन की सबसे बड़ी अनमोल पूँजी है।