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आज के विचार “श्रीकृष्णसखा ‘मधुमंगल’ की आत्मकथा-104” ( बृजमण्डल में हाहाकार ) 17, 6, 2025 ************************************ कल तै आगे कौ प्रसंग - मैं मधुमंगल ..... हमारे प्राण कन्हैया के यमुना हृद में कूदते ही , हम सब तौ मानौं निष्प्राण ही है गए । कन्हैया के बिना हम अपने जीवन की कल्पना हूँ नाँय कर सके हैं । श्रीदामा तौ मूर्छित ही है गयौ है ...बिचारौ सुबल सखा हिलकियनते रोय रोय के अवनी में गिर रह्यो है । और मेरौ हृदय तब कांप्यों जब यमुना हृद ते विष कौ बुलबुला छूटन लग्यो । ओह ! मैंने अपने आपकूँ शान्त रख्यो ....क्यों कि मैं ही विचलित है गयौ तौ कौन इन सबकूँ सम्भालेगौ । दाऊ भैया कहाँ हैं ? तोक सखा ने पूछी । फिर स्वयं ही बोल्यो ....उनकूँ कन्हैया ने आन नाँय दियौ .....दाऊ भैया होते तौ कछु करते ...कन्हैया कूँ बचाय लै तै । गोप ग्वाल ही नही रो रहे ....अब तौ पशु पक्षी हूँ रोयवे लगे । पूरौ श्रीवृन्दावन ही शोकाकुल ह्वै उठ्यो हो । बा स्थिति में मैंने विचार कियौ कि ...... अब हमें वापस नन्दगाँव जानौं चहिए .......वहाँ बृजराज बाबा हैं दाऊ भैया हैं कोई उपाय निकालेंगे । जे बात जब मैंने कही ...तब विशाल नामकौ सखा बोल्यो ....कन्हैया तौ विष में जल रह्यो होयगौ ! आह ! बाके कोमल अंग ! मैंने सबकूँ समझायौ ....फिर कही.....अब चलो ...कन्हैया कूँ कछु नही होयगौ । मेरी बात मानके रोते बिलखते सब चल पड़े हे ....नन्दगाँव की ओर । *********************************************** मैं एक बात कह दऊँ .....कन्हैया दाऊ भैया कूँ लै कै या ‘कालीदह की लीला’ में नही आयौ ....अब मोकूँ थोड़ी थोड़ी समझ आय रही है कि कन्हैया चौं ना लायौ दाऊ भैया कूँ । या लिए कि कन्हैया ने विचार कियौ .....दाऊ भैया हैं शेषनाग के अवतार , और आज मैं कालिनाग ते लड़ूँगौ ....और अगर दाऊ ने कालीय कूँ मारते मोकूँ देख लियौ तौ कहीं जाति कौ पक्ष दाऊ न लै लैं । ( जे लिखते भए मधुमंगल हँसते हैं ) या कन्हैया नाँय लायौ दाऊ भैया कूँ । वैसे सब लीला हैं .....अब लीला तौ लीला ही है । ****************************************************** इधर - यशोदा मैया भोजन बना रही हैं .....उनकौ हृदय एकाएक धक् करवे लग्यो । घबराहट शुरू है गयी मैया के .....भोजन बनानौं हूँ अब कठिन है गयौ तौ एक गोपी कूँ कहके मैया बाहर आय गयीं । इधर उधर देखवे लगीं , फिर सोचवे लगीं ....”कन्हैया ठीक तौ है” , मैया ने तभी देख्यो ....सामने दाऊ खड़े हैं । मैया घबराई ....दाऊ ! अरे तू यहाँ ? आज तू नही गयौ कन्हैया के संग ? मैया ने जब पूछी तौ दाऊ बोले ...गयौ हो ...लेकिन कन्हैया ने मोकूँ भेज दियौ ...और बोलो ....कि भैया ! तुम जाओ ......आज हम अपने वय के बालकन के संग खेलिंगे । दाऊ की बात सुनते ही मैया यशोदा तौ रोयवे लगीं .......का भयौ ? सब गोपियाँ दौड़ी दौड़ी आयीं ...दाऊ मैया कूँ सम्भाल रहे हैं ......का बात है मैया ? बता ना ? मैया रोते बोलीं ....दाऊ ! वो कालीदह में गयौ है । हाँ , कन्हैया अवश्य कालीदह में गयौ है । दाऊ ! बाने कल सुन लियौ हो कि कालिदह में नाग रहे है ....नाग तै खेलवे की बाकी इच्छा ......पर बा बालक कूँ कहा पतौ कि ...कालिय नाग सामान्य नाग नही है .......मैया कूँ या प्रकार तै रोतौ देख .....सब आयवे लगे ....बृजराज बाबा हूँ आय गए । सबने समझायौ मैया कूँ ...लेकिन । तभी सामने तै ..........हम सब सखा आय रहे हैं ..... मधुमंगल ! मधुमंगल ! कन्हैया कहाँ है ? मैया दौड़ीं आयीं और पूछवे लगीं ....अब मेरे आखिन तै अश्रु बह रहे ...मैं कहा कहतौ । बता ना , कहाँ है कन्हैया .....बृजराज बाबा पूछ रहे हैं ...कहाँ है कन्हैया ? तब मैंने कही ....मैया ! बाबा ! कन्हैया तौ कारीदह में कूद गयौ । का कही ! मैया चीखी और मूर्छित है गयी .......बाबा बृजराज कौ हृदय चीत्कार कर रह्यो है ....अन्य बृजवासिन कूँ लगवे लग्यो कि हमारे तौ प्राण ही चले गए .........पूरे बृजमण्डल में जे बात फैल गयी ....श्रीकृष्ण विरह में पूरौ बृजमण्डल डूब गयौ हो । क्रमशः Hari sharan

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