
Rama Devi Sahu
75 days ago
"जब आपके हृदय में श्रीकृष्ण का स्मरण जागता है, तब यह समझना चाहिए कि यह केवल आपकी इच्छा नहीं है; यह स्वयं श्रीकृष्ण की कृपा और स्मृति का प्रसाद है।" जीव की बुद्धि सीमित है, इन्द्रियाँ सीमित हैं, मन चंचल है और सामर्थ्य अल्प है। ऐसे में अनन्त ब्रह्माण्डों के स्वामी, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण अपने बल पर होना सम्भव नहीं। जब भगवान की कृपा होती है, तभी जीव के हृदय में उनके चिन्तन की प्रेरणा उत्पन्न होती है। भगवान स्वयं कहते हैं— सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च। — भगवद्गीता 15.15 मैं सबके हृदय में स्थित हूँ। स्मृति, ज्ञान और विस्मरण भी मुझसे ही प्राप्त होते हैं। अतः भगवान की स्मृति भी उन्हीं की देन है। यदि किसी के मन में श्रीकृष्ण का नाम, रूप, गुण या लीला बार-बार आने लगे, तो यह उनकी विशेष कृपा का संकेत है। श्रीमद्भागवत में कहा गया है— श्रृण्वतां स्वकथाः कृष्णः पुण्यश्रवणकीर्तनः। हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम्॥ — भागवत 1.2.17 अर्थात् जो भक्त भगवान की कथाएँ सुनते हैं, उनके हृदय में स्थित श्रीकृष्ण स्वयं प्रवेश करके हृदय की अशुद्धियों को दूर करते हैं। जब भगवान हृदय को शुद्ध करने लगते हैं, तब उनका स्मरण सहज होने लगता है। इसलिए कृष्ण-स्मरण जीव की उपलब्धि नहीं, बल्कि भगवान की करुणा का परिणाम है। नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥ — कठोपनिषद् 1.2.23 परमात्मा केवल बुद्धि, वाक्पटुता या अधिक अध्ययन से प्राप्त नहीं होते; जिन पर वे स्वयं कृपा करते हैं, उन्हीं को अपना स्वरूप प्रकट करते हैं। इसीलिए संत कहते हैं कि भगवान को पाने की यात्रा भगवान से ही आरम्भ होती है। जिस दिन आपके भीतर श्रीकृष्ण का नाम लेने की इच्छा जागी, उसी दिन समझ लीजिए कि उनकी कृपादृष्टि आप पर पड़ चुकी है। भक्ति परम्परा में कहा जाता है— कृष्ण यदि कृपा करें कोनो भाग्यवाने। गुरु-अन्तर्यामि-रूपे शिक्षाय आपनि॥ जब श्रीकृष्ण किसी भाग्यवान जीव पर कृपा करते हैं, तब वे गुरु और अन्तर्यामी के रूप में स्वयं उसे मार्ग दिखाते हैं। विचार कीजिए—जो भगवान अनन्त ब्रह्माण्डों का संचालन कर रहे हैं, जिनके एक रोमकूप में असंख्य ब्रह्माण्ड विद्यमान हैं, उन भगवान का स्मरण इस छोटे से मन में कैसे आ सकता है? यह उसी प्रकार है जैसे एक छोटी दीपशिखा सूर्य को प्रकाशित नहीं कर सकती; बल्कि सूर्य की किरण ही दीपक को प्रकाशित करती है। उसी प्रकार जीव भगवान को याद नहीं करता, बल्कि भगवान की कृपा जीव को अपनी ओर खींचती है। अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज। — श्रीमद्भागवत 9.4.63 भगवान अपने भक्तों के प्रेम से बंध जाते हैं और उनके हृदय में निवास करते हैं। इसलिए जब भी अचानक श्रीकृष्ण का नाम स्मरण हो, उनकी बाँसुरी याद आए, वृन्दावन की छवि मन में उभरे, या बिना कारण "राधे-राधे" कहने का मन हो, तब इसे साधारण घटना न समझें। यह संकेत है कि कहीं न कहीं श्रीकृष्ण की कृपा आपके जीवन को स्पर्श कर रही है। भावार्थ:: "मैं श्रीकृष्ण को याद कर रहा हूँ" — यह आधा सत्य है। पूर्ण सत्य यह है कि — "श्रीकृष्ण मुझे याद कर रहे हैं, इसलिए मैं उन्हें याद कर पा रहा हूँ।" "कृष्ण-स्मरण जीव का पुरुषार्थ नहीं, भगवान की कृपा का प्रसाद है।" "जिसे कृष्ण याद आ जाएँ, समझो कृष्ण ने उसे अपने हृदय में स्थान दे दिया है।" ॥ राधे कृष्ण ॥
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