
Rama Devi Sahu
111 days ago
माँ---'यह कलियुग की पराकाष्ठा हो सकती है, संवेदनाओं का अकाल हो सकता है... पर माँ, तुम कल भी वही थी, तुम आज भी वही हो। ●●●बरगी डैम की त्रासदी: जहाँ व्यवस्था हारी, पर ममता जीत गई जबलपुर के बरगी डैम में घटी वह हृदयविदारक घटना महज़ एक ‘हादसा’ नहीं है। वह हमारे आधुनिक समाज के चेहरे पर एक तमाचा है और हमारी व्यवस्थाओं की खोखली नींव का आईना भी। लेकिन उस भयावह शोर और पानी के सैलाब के बीच से एक ऐसी तस्वीर उभरी, जिसने मृत्यु को भी निशब्द कर दिया— अपने बच्चे को सीने से लगाए एक माँ। कलियुग का कठोर सत्य और माँ की शाश्वत ममता अक्सर कहा जाता है कि हम ‘घोर कलियुग’ में जी रहे हैं— एक ऐसा समय, जहाँ: रिश्ते स्वार्थ की भेंट चढ़ रहे हैं, संवेदनाएँ ‘लाइक’ और ‘रील’ तक सीमित हो गई हैं, मानवीय मूल्य धीरे-धीरे धुंधले पड़ रहे हैं। परंतु, बरगी डैम की उस माँ ने यह सिद्ध कर दिया कि समय चाहे कितना भी कठोर क्यों न हो जाए, सृष्टि का सबसे पवित्र सत्य आज भी अडिग है— “माँ, तुम आज भी वही हो।” जब मृत्यु सामने खड़ी थी और जीवन की डोर टूट रही थी, तब भी उस माँ का अंतिम प्रयास स्वयं को बचाने का नहीं, बल्कि अपनी संतान को सुरक्षा देने का था। --- एक अनुत्तरित प्रश्न यह घटना जहाँ माँ के प्रेम की पराकाष्ठा को दर्शाती है, वहीं यह व्यवस्था से एक कठोर प्रश्न भी पूछती है— क्या हमारी सुरक्षा व्यवस्था इतनी कमजोर है कि उसकी लापरवाही की कीमत मासूम जिंदगियाँ चुकाएँ? उजड़े हुए परिवारों, टूटे सपनों और अधूरी कहानियों का हिसाब आखिर कौन देगा? --- ज्योतिषीय और आध्यात्मिक बोध ज्योतिष में चंद्रमा को ‘माता’, ‘सुरक्षा’ और ‘भावनाओं’ का कारक माना गया है। जब जीवन में अचानक संकट (राहु-केतु जैसे अप्रत्याशित योग) घेर लेते हैं, तब केवल माँ ही वह शक्ति होती है जो अंतिम क्षण तक सुरक्षा का भाव देती है। --- दो सबक, एक सत्य बरगी डैम की यह त्रासदी हमें दो स्पष्ट संदेश देती है— 1. कड़वा सत्य: लापरवाही और असावधानी कभी-कभी अपूरणीय क्षति बन जाती है। 2. अमर सत्य: युग बदल सकते हैं, समय बदल सकता है, पर माँ का प्रेम कभी नहीं बदलता। --- यह घोर कलियुग है… पर माँ, तुम आज भी वही हो।

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