
Rama Devi Sahu
206 days ago
समर्पण का अर्थ है, समस्त अर्पण कर देना, उसके बावजूद भी आप किसी समस्या से विचलित हो जाते हैं, तब भी आपका समर्पण भाव आपके ईष्ट के प्रति पूर्ण व सच्चा नहीं है,। हमें केवल कर्म करने की पूर्ण स्वतंत्रता दी गई है, उसमें भी विचारों की एक मर्यादा निश्चित कर दी गई है, कर्म अनुसार आपको उसके प्रतिफल प्रदान किए जाएंगे, फिर भी आप कर्ता नहीं हो सकते हैं क्योंकि कर्ता केवल एक है, बिना उसके मर्जी के आप उसका नाम तक स्मरण नहीं कर सकते, यदि कर्ता भाव में आप स्वयं को रख कर कोई कर्म करते हैं तो समझ ले उसके आए भार के लिए आप किसी और को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते,। और उस भार के लिए आप अपने ईष्ट को भी नहीं पुकार सकते क्योंकि आपने स्वयं को कर्ता स्थान पर रख लिया है तो अब आप इतने तो शक्षम हो,या होंगे। अब पूरी की पूरी अच्छे या बुरे की जिम्मेदारी आपकी है। इसीलिए केवल कर्म कीजिए और अपनी जिम्मेदारी प्रकृति को समर्पित कर दीजिए । उससे अच्छा न्याय कोई और नहीं कर सकता । 🌹🌹🌹जय श्री नाथ जी की 🌹🌹🌹 🌺🌺🌺 आदेश आदेश आदेश 🌺🌺🌺
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