
Rama Devi Sahu
186 days ago
|| जय श्री राधा माधव || *माँ–बाप का डाँटना या समझाना कभी भी द्वेष या क्रोध से प्रेरित नहीं होता। उनके शब्दों के पीछे उनका अनुभव, चिंता और निःस्वार्थ प्रेम छिपा होता है।* जब संतान अपरिपक्व होती है, तब वह इसे रोक-टोक या हस्तक्षेप समझती है, पर जैसे ही वही संतान स्वयं माता-पिता बनती है, तब उसे समझ आता है कि हर कठोर शब्द के पीछे संतान के भविष्य की सुरक्षा और भलाई का भाव होता है। ~ हरिॐ जी ~ *माता-पिता जीवन की कठिनाइयों, संघर्षों और गलतियों से बहुत कुछ सीख चुके होते हैं। वे नहीं चाहते कि उनकी संतान वही ठोकरें खाए, जो उन्होंने अपने जीवन में खाईं।* इसलिए वे कभी डाँटते हैं, कभी टोकते हैं और कभी सख़्त शब्दों का प्रयोग करते हैं। *आज की नई पीढ़ी (GenZ) अक्सर इसे अपनी स्वतंत्रता पर आघात मान लेती है* और आवेश में आकर ऊँची आवाज़ में बात करने लगती है। *वास्तव में, माता-पिता की बातें आदेश नहीं, बल्कि अनुभव की सीख होती हैं।* यदि संतान धैर्य रखकर, बिना गुस्से के उनकी बातों को समझने का प्रयास करे, तो वही बातें आगे चलकर जीवन में मार्गदर्शक सिद्ध होती हैं। माँ-बाप की डाँट समय के साथ आशीर्वाद बन जाती है, और उनका हर वाक्य संतान के उज्ज्वल भविष्य की कामना से ही जुड़ा होता है। || श्री गुरु चरणं | श्री कृष्ण शरणम् || ईश्वर सत्य है

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