
बद्रीप्रसादअसाटी
295 days ago
।।श्रीहरिः।। |।एक भगवत्प्राप्त संत का अनुभव || ---------------------------------------- भाईजी ने एक बार अपने प्रवचन में कहा था -- भगवन्नाम के अनुभव मैं क्या बताऊँ? मेरे जीवन में जो कुछ भी अच्छापन है, वह केवल भगवन्नाम और भगवत्कृपा की महिमा है। बाकी सारी बुराई मेरी है। मैं सच कहता हूँ, मेरे पास अगर कोई धन है तो भगवन्नाम और भगवत्कृपा का। इसका मुझे अभिमान है। अभिमान होना नहीं चाहिए, पर अभिमान है कि मुझपर भगवान् की अनन्त कृपा बरस रही है। यह मुझे निरंतर भान होता है, आज से नहीं, बहुत पहले से ऐसा भान होता है कि मुझपर भगवान् की अनन्त कृपा बरस रही है। तुलसीदास जी के एक पद की अन्तिम दो पंक्तियों को मैने अपने जीवन में बहुत अच्छा समझा और उसको उतारने की चेष्टा की-- "सकल अंग पद बिमुख नाथ मुख नाम की ओट लई है। है तुलसिहिं परतीति एक प्रभु- मूरति कृपामई है।। " " सारे अँग, हे नाथ।! आपके चरणों से विमुख हैं। केवल जीभ ने नाम की ओट ले रखी है और एक ही विश्वास है --" प्रभु- मूरति कृपामई है "। बड़े - बड़े संकट आये - संकटो की अवधि नहीं। जिस समय पकड़ा गया, उस समय घर पर बड़ा संकट था। उसके बाद एक व्यापार में घाटा लगा, उसका बड़ा संकट था। एक बार हमारे कुछ दोस्तों ने एक कांस्पिरेसी ( षड्यन्त्र) की और एक बहुत बड़े निन्दनीय अपराध में फँसाना चाहा। बिलकुल झूठी चीज थी। उसमें भी भगवान् की कृपा ने बचाया। आप सबको अपने अनुभव के रुप में केवल दो ही बातें कह सकता हूँ -- एक तो भगवत्कृपा पर विश्वास और एक भगवन्नाम का आश्रय। उसके सिवा न बुद्धि है, न विद्या है, न कला है। मैं कुछ नहीं जानता। साहित्य का मुझे क्या पता? मैे पढ़ा लिखा नहीं, परन्तु सभी जगह बड़े बड़े साहित्यिक लोगों ने मुझ पर कृपा की। हिन्दुस्तान के मूर्धन्य बड़े बड़े लेखकों का " कल्याण" में सहयोग मिला। श्रीविष्णुदिगम्बर सरीखे महान् संगीताचार्य मुझे संगीत सिखाने के लिये महीनों तक घर पर आये, पर मैं अभागा कि नहीं सीखा।इतना उनका प्रेम मेरे प्रति था। देश के बड़े बड़े मूर्धन्य व्यक्ति, जैसे मालवीयजी,उन मालवीयजी के परिवार का मैं था। गाँधी जी ने मुझे अपने परिवार का माना। श्री अरविन्द के साथ मेरा सम्बन्ध रहा। मेरे अयोग्य होते हुए भी क्यों इतनी बातें हुई? मैने अनुभव किया, मेरी अयोग्यता की अपेक्षा भगवान् की कृपा कहीं अधिक बड़ी शक्ति रखती है और वह कृपा निरंतर बरसती रहती है। उस कृपा के भरोसे मुझे अशान्ति के स्थान पर शान्ति मिली। दु:ख और निराशा जहाँ चारों और मंडरा जाते, ऐसी अवस्था में मुझे आशा मिली, विषाद से निकलने का पवित्र और सरल मार्ग मिला। और यह सब हुआ केवल भगवत्कृपा और भगवन्नाम से।" किसी ने श्री भाईजी से प्रश्न किया - सर्वोत्तम साधन क्या है ? भाईजी ने उत्तर दिया - मेरी तो first, last & latest discovery (प्रथम, अन्तिम और नवीनतम अविष्कार )यही है कि अपना कल्याण चाहने वाला व्यक्ति नाम का आश्रय पकड़ले और साधन हो सके तो अवश्य करे ,किसी का विरोध नही है परन्तु और कुछ भी न हो सके तो केवल जीभ से निरन्तर नाम जप करता रहे। भगवन्नाम के अनुभव मैं क्या बताऊँ जीवन में जो कुछ भी अच्छापन है वह केवल भगवन्नाम और भगवत्कृपा की महिमा है।मैं सच कहता हूँ कि मेरे पास अगर कोई धन है तो भगवन्नाम और भगवत्कृपा का । भगवान के मंगलमय नाम से ऐसा कौन सा कार्य है,जो सिद्ध नहीं हो सकता ; ऐसा कौनसा महापाप है,जिसका नाश नही हो सकता।ऐसी कौनसी परम गति या मुक्ति है ,जो नाम से नहीं मिलती । जब तुम विश्वासकी दृष्टि प्राप्त कर लोगे, तब तुम्हें यह प्रत्यक्ष दिखलायी देगा कि तुम्हें प्राप्त होनेवाले प्रत्येक पदार्थ और परिस्थितिमें भगवत्कृपाका मंगलमय कार्य हो रहा है।

Comments (1)

बद्रीप्रसादअसाटी
Nov 8, 2025
ऊं नमो भगवते वासुदेवाय
