MyMandirInstall

महाभागवत में एक अद्भुत प्रसंग का वर्णन है जिसमें भगवान ब्रह्मा जी ने प्रभु श्रीराम को लोकशिक्षा की लीला के लिए यथार्थ सत्य कहकर देवी आराधना का माहात्म्य बताया । ब्रह्माण्डकोटिकोटिस्था ब्रह्माणः कोटिकोटयः। कोटयो हलहस्ताश्च कोटयो हरयः शिवाः॥ सन्ति राम महाबाहो किमन्यच्च ब्रवीमि ते। अर्थात् हे महाबाहु कौशल्यापुत्र राम! करोड़ों-करोड़ों ब्रह्माण्डों में असंख्य ब्रह्मा विद्यमान हैं। उसी प्रकार करोड़ों-करोड़ों हल धारण करने वाले बलराम, करोड़ों-करोड़ों हरि (अर्थात् विष्णु ) और करोड़ों-करोड़ों शिव ( रुद्र ) भी विद्यमान हैं। हे राम! जब ऐसी अनंत सत्ता का वर्णन किया जा चुका है, तब मैं तुम्हें और क्या कहूँ? विस्तृत व्याख्या यह श्लोक साधारण दृष्टि से देखने पर केवल देवताओं की संख्या की विशालता बताता हुआ प्रतीत होता है, लेकिन इसके भीतर ब्रह्माण्ड और परमशक्ति के संबंध का अत्यंत गहरा दर्शन छिपा हुआ है। यह तो पराशक्ति का माहात्म्य है ही श्रीमद्देवीभागवत महापुराण और शिव पुराण में तो त्रिदेव पद ( पालन कर्ता विष्णु पद , संहारक पद तथा सृजनात्मक पद ) के लिए भी दो उपाय बताये गए हैं। हमें केवल यही ब्रह्माण्ड दिखाई व सुनाई देता है वह भी आंशिक। मनुष्य सामान्यतः जिस ब्रह्माण्ड को देखता है, उसी को संपूर्ण सृष्टि मान लेता है। उसे लगता है कि यही एक पृथ्वी है, यही एक सूर्य है, यही एक ब्रह्मा हैं, यही एक विष्णु हैं और यही एक शिव हैं। और एक ही चंदा है। पर अनेकानेक चंद्रमाओं की खोज तो वैज्ञानिक भी कर चुके हैं। तथा अलग अलग ग्रह पर अलग-अलग कालगणना ( तीव्रवेग का समय ) भी हम सुन चुके जो कि सत्य ही निकली अतः सब कुछ सत्य ही घोषित होगा। आप भले ही केवल शास्त्र की मानो या न मानों। और एक ही ब्रह्माण्ड मत समझो। पुराणों की विराट दृष्टि इस सीमित कल्पना को तोड़ती है। यहाँ कहा जा रहा है कि ब्रह्माण्ड करोड़ों-करोड़ों हैं और प्रत्येक ब्रह्माण्ड में सृष्टि-व्यवस्था के लिए ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि की सत्ता भी असंख्य रूपों में विद्यमान है। “ब्रह्माण्डकोटिकोटिस्था”—अर्थात् जो करोड़ों-करोड़ों ब्रह्माण्डों में स्थित हैं। यहाँ भगवती की सत्ता को किसी एक लोक, किसी एक ग्रह या किसी एक ब्रह्माण्ड तक सीमित नहीं किया गया। वे उस अनंत सत्ता के रूप में वर्णित हैं जिसकी उपस्थिति असंख्य ब्रह्माण्डों को धारण करती है। इससे साधक को यह शिक्षा मिलती है कि देवी की महिमा को केवल किसी एक मंदिर की मूर्ति अथवा किसी एक स्थान तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। जिस शक्ति से एक ब्रह्माण्ड संचालित होता है, वही शक्ति अनंत ब्रह्माण्डों में भी व्याप्त है। इसके बाद कहा गया—“ब्रह्माणः कोटिकोटयः”—अर्थात् असंख्य ब्रह्मा। ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता माने जाते हैं। यदि ब्रह्माण्ड असंख्य हैं, तो प्रत्येक ब्रह्माण्ड की अपनी सृष्टि-व्यवस्था भी हो सकती है। इसलिए यहाँ एक अत्यंत विराट कल्पना सामने आती है—सृष्टिकर्ता भी अनंत हैं, क्योंकि सृष्टियाँ अनंत हैं। यह बात मनुष्य के अहंकार को अत्यंत छोटा कर देती है। जिस ब्रह्माण्ड को हम इतना विशाल समझकर चकित होते हैं, वह भी अनंत सत्ता की दृष्टि में केवल एक व्यवस्था हो सकता है। अतः सकामियों के लिए आज हम अक्षयरुद्र अंशभूतशिव यह बात अवश्य कहते हैं कि - आप अगले 50 वर्ष ( 600 महिने ) की कीर्ति के लिए इहलोक में किसी की चप्पलों को मत चाटो और आप चुपचाप नीमकरोली बाबा की तरह अनंत सुख के लिए एकमात्र भजन पर ध्यान दो और 50 वर्ष के बाद तो अनिवार्य ही। अन्यथा कुछ भी हाथ न आ सकेगा। मरने के बाद आपका नाम भी ( तीन पीढ़ियों के बाद खत्म हो जायेगा , नाते रिस्तेदार तो वैसे भी लेन-देन का सौदा मात्र बचा है - फिर काहे यराना या फोलोवर बढ़ाने के चक्कर में भजन छोड़ रहे हो भाई ) “कोटयो हलहस्ताश्च”—यहाँ हल धारण करने वाले बलराम के असंख्य रूपों का संकेत है। बलराम शक्ति, बल और धर्म के आधार के रूप में पूजित हैं। अर्थात् जहाँ-जहाँ सृष्टि की व्यवस्था है, वहाँ दिव्य शक्ति के विभिन्न रूप भी विद्यमान हैं। इसी प्रकार “कोटयो हरयः” में असंख्य हरि अर्थात् विष्णु के रूपों का उल्लेख है। विष्णु पालन और संरक्षण की शक्ति के प्रतीक हैं। और “शिवाः” के द्वारा असंख्य शिवों की सत्ता का संकेत मिलता है। इस प्रकार एक ही श्लोक में सृष्टि, स्थिति और संहार की शक्तियों को अनंत ब्रह्माण्डों में विस्तारित कर दिया गया है। ब्रह्मा सृजन की शक्ति हैं, विष्णु पालन की शक्ति हैं और शिव संहार तथा परिवर्तन की शक्ति हैं। इन सबके पीछे जो मूल शक्ति है, वही भगवती है। इसलिए देवी को केवल “एक देवी” मान लेना उनके इस विराट स्वरूप को समझना नहीं है। वे

Post media

Comments (0)

No comments yet. Be the first to comment!