
Rama Devi Sahu
305 days ago
पुरी नगरी में एक बहुत ही गरीब ब्राह्मण रहता था। उसका नाम विश्वनाथ था। उसके पास न धन था, न कोई परिवार — बस भगवान जगन्नाथ में उसकी अटूट श्रद्धा थी। हर दिन वह मंदिर जाता, भगवान को प्रणाम करता और वहीं बैठकर भजन गाता। वह भगवान को कोई बड़ा प्रसाद नहीं चढ़ा सकता था — बस एक छोटी सी तुलसी की माला और प्रेम से भरा हृदय ही उसकी भेंट थी। एक दिन भयंकर वर्षा हुई। मंदिर तक पहुँचना मुश्किल था। लेकिन विश्वनाथ ने सोचा, “अगर मैं नहीं गया, तो मेरे प्रभु मेरा इंतज़ार करेंगे।” वह भीगते हुए मंदिर पहुँचा। मंदिर के कपाट बंद हो चुके थे। उसने द्वार के बाहर ही बैठकर भगवान के लिए भजन गाना शुरू किया। उसकी आवाज़ इतनी भावपूर्ण थी कि मंदिर के अंदर भगवान स्वयं सुनने लगे। रात के अंधेरे में अचानक मंदिर के पुजारी ने देखा — भगवान जगन्नाथ के वस्त्र गीले हैं, और उनके चरणों पर मिट्टी लगी हुई है! पुजारी ने चकित होकर पूछा, “हे प्रभु! यह क्या हुआ?” तभी एक दिव्य आवाज़ आई — “मेरा भक्त विश्वनाथ भीगते हुए मंदिर के बाहर भजन गा रहा था। मैं उसे देखने चला गया था।” यह सुनकर पुजारी की आँखों से आँसू बहने लगे। अगले दिन जब मंदिर के द्वार खुले, तो भगवान जगन्नाथ के पास विश्वनाथ खड़ा था, मुस्कुरा रहा था — क्योंकि वह जान चुका था कि भक्ति में प्रेम सच्चा हो, तो भगवान स्वयं दौड़े चले आते हैं।

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