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Rama Devi Sahu

11 days ago

स्वर्ग पर जब एक असुर ने ऐसा अधिकार जमाया कि पृथ्वी पर वर्षों तक वर्षा की एक बूँद न गिरी... तब साक्षात जगदंबा ने नौ रातों तक अपनी आँखों से निरंतर अश्रु बहाकर पूरी पृथ्वी को कैसे हरा-भरा किया? जानिए 'देवीभागवत' का वह दुर्लभ रहस्य रुरु वंश में 'दुर्गम' नाम का एक अत्यंत धूर्त और पराक्रमी दैत्य उत्पन्न हुआ। उसने विचार किया कि देवताओं का बल उनके यज्ञों में है, और यज्ञ वेदों के मंत्रों पर टिके हैं।उसने हिमालय पर जाकर सहस्रों वर्षों तक ब्रह्मा जी की घोर तपस्या की। जब ब्रह्मा जी प्रकट हुए, तो दुर्गमासुर ने तीनों लोकों की सत्ता नहीं, बल्कि एक विचित्र वरदान माँगा:हे पितामह! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो चारों वेद और ब्राह्मणों के समस्त वैदिक मंत्र मुझे सौंप दीजिए, और वेदों का ज्ञान ऋषियों की स्मृति से सदा के लिए लुप्त हो जाए! ब्रह्मा जी ने "तथास्तु" कहा।वरदान पाते ही संपूर्ण पृथ्वी से वेदों का लोप हो गया। ब्राह्मण यज्ञ, संध्यावंदन और स्वाध्याय भूल गए। जब यज्ञ की आहुतियाँ बंद हो गईं, तो देवताओं का तेज क्षीण होने लगा। दुर्गमासुर के प्रभाव से वरुण देव ने जल बरसाना बंद कर दिया। लगातार सौ वर्षों तक पृथ्वी पर वर्षा की एक बूँद नहीं गिरी। गंगा, यमुना, सरस्वती जैसी पावन नदियाँ सूखकर रेतीले मैदान बन गईं।जलाशय और कुएँ सूख गए, वृक्ष जलकर ठूंठ हो गए। पशु-पक्षी तड़प-तड़प कर मरने लगे, चारों ओर अस्थियों के ढेर लग गए।मनुष्य भूख और प्यास से व्याकुल होकर एक-दूसरे को नोंचने लगे।देवता और ऋषि अपनी बची हुई शक्ति समेटकर हिमालय की गुप्त कंदराओं में छिप गए। वहाँ उन्होंने जगतजननी, आद्याशक्ति माँ जगदंबा की करुण पुकार प्रारंभ की: "हे माँ! हे करुणामयी! अपनी संतानों पर दया करो! यदि तुम नहीं सुनोगी, तो यह चराचर जगत आज ही नष्ट हो जाएगा। ऋषियों और देवताओं की उस आर्त पुकार से हिमालय की गुफाओं में एक दिव्य प्रकाश पुंज प्रकट हुआ। उस महातेज के मध्य से साक्षात भगवती भुवनेश्वरी प्रकट हुईं।माँ का यह रूप न केवल अलौकिक था, बल्कि करुणा की पराकाष्ठा था।संसार के दुख, सूखे कंठों और भूख से तड़पते जीवों को देखकर माँ का हृदय विदीर्ण हो गया। उसी क्षण माँ के श्रीअंग पर सौ दिव्य नेत्र (शताक्षी) प्रकट हो गए।माँ उन सौ नेत्रों से अपनी संतप्त संतानों को देखने लगीं और उनके सभी नेत्रों से निरंतर अश्रु की पावन धाराएं बहने लगीं। शास्त्रों के अनुसार, माँ ने लगातार नौ दिनों और नौ रातों (नवरात्रि की गुप्त कालावधि) तक अविरल प्रेमाश्रु बहाए। माँ के उन दिव्य आंसुओं से:नदियाँ पुनः कल-कल करती हुई जल से भर गईं। सरोवर, कूप और बावड़ियां अमृततुल्य शीतल जल से लबालब हो गईं।धरती की जलन शांत हुई और पाताल तक जल का संचार हो गया।सौ नेत्रों से करुणा बरसाने के कारण देवताओं ने माँ का पहला नामकरण किया—'शताक्षी । जल की समस्या तो हल हो गई, परंतु पूरी पृथ्वी पर अन्न का एक दाना भी नहीं बचा था। जीव अब भी भूख से मरणासन्न थे। तब माँ शताक्षी ने एक और अद्भुत लीला रची।माँ ने अपने हाथों और शरीर से नाना प्रकार की हरी शाक-सब्जियाँ, रसीले फल, कंद-मूल, औषधियाँ, धान, गेहूँ और गन्ने प्रकट किए। माँ ने उन समस्त खाद्य पदार्थों से भूखे मनुष्यों, ऋषियों और यहाँ तक कि वन के पशु-पक्षियों को भी तृप्त किया।जब तक पृथ्वी पर नई फसलें नहीं लहलहाईं, माँ स्वयं अपने स्वरूप से समस्त सृष्टि का भरण-पोषण करती रहीं।शाक और वनस्पतियों से चराचर जगत के प्राणों की रक्षा करने के कारण माँ का दूसरा अमर नाम पड़ा—'शाकम्भरी'। जब दुर्गमासुर को ज्ञात हुआ कि उसकी रची हुई भुखमरी और अकाल को एक देवी ने समाप्त कर दिया है, तो वह अपनी अक्षौहिणी सेना लेकर हिमालय पर चढ़ आया।माँ ने अपने शरीर से 'काली', 'तारा', 'छिन्नमस्ता', 'बगलामुखी' आदि बत्तीस मातृकाओं और शक्तियों को प्रकट किया एक भयंकर युद्ध हुआ। दुर्गमासुर ने बाणों की वर्षा की, परंतु माँ शाकम्भरी ने अपने त्रिशूल से दुर्गमासुर की छाती को चीर दिया।दुर्गमासुर के मरते ही उसके शरीर के भीतर बंधे हुए चारों वेद और समस्त ऋचाएं ज्योतिर्मय रूप में बाहर निकलीं और पुनः ऋषियों के अंतःकरण में स्थापित हो गईं। संपूर्ण ब्रह्मांड में धर्म और वेदों की पुनर्स्थापना हुई।दुर्गम नामक महादैत्य का संहार करने के कारण माँ का तीसरा नाम 'दुर्गा' प्रसिद्ध हुआ।

Comments (4)

Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

Oct 11, 2026

शारदीय #नवरात्रि के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं। माँ जगतजननी आप सभी की हर मनोकामना पूर्ण करें। मेरी यही प्रार्थना है। जय माता दी। 🙏🏻

Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

Oct 11, 2026

🙏🌺 Jai Mata Di 🌺🙏 Subha Ratri Ji 🙏 Om Shiv Om 🔱

sanjeev kohli ॐ 🔱 ॐ 🙏 🌹🚩

sanjeev kohli ॐ 🔱 ॐ 🙏 🌹🚩

Oct 11, 2026

जय जय अम्बे 🌸 जय जगदम्बे 🌸 जय माता दी 🙏🌹🚩 शुभ रात्रि 🌙✨💐🙏