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Rama Devi Sahu

157 days ago

यह प्रसंग भक्ति और मर्यादा की गहराई को दर्शाता है। मान्यता के अनुसार, जब माता सीता जी विवाह के बाद अयोध्या पहुँचीं, तब उन्होंने तुरंत वहाँ का जल ग्रहण नहीं किया। इसके पीछे का आध्यात्मिक भाव: 1. पति को ही अपना सर्वस्व मानना माता सीता ने श्रीराम को ही अपना जीवन, अपना ईश्वर और अपना सब कुछ मान लिया था। इसलिए उन्होंने कहा— 👉 “जब तक प्रभु श्रीराम स्वयं मुझे स्वीकार कर अपने हाथों से जल नहीं देंगे, तब तक मैं कुछ ग्रहण नहीं करूँगी।” 2. समर्पण और मर्यादा का प्रतीक यह केवल एक नियम नहीं था, बल्कि पूर्ण समर्पण का भाव था। सीता जी यह दिखाना चाहती थीं कि अब उनका अस्तित्व पूरी तरह श्रीराम से जुड़ा है। 3. ‘पतिव्रता धर्म’ की उच्चतम मिसाल उनका यह व्यवहार बताता है कि सच्चा प्रेम केवल साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि आत्मा से आत्मा के जुड़ने का नाम है। गहरा संदेश ✨ जहाँ समर्पण होता है, वहाँ अहंकार नहीं रहता… और जहाँ अहंकार नहीं होता, वहीं सच्चा प्रेम जन्म लेता है। सीता जी का यह भाव हमें सिखाता है जब जीवन में ‘राम’ आ जाएँ, तो बाकी सब स्वतः ही पवित्र हो जाता है। 🙏

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