
Rama Devi Sahu
134 days ago
🌿परम आनंद की झंकार का नृत्य🌿 तुम्हारे भीतर जो हर पल बात चल रही है, वही परमात्मा और तुम्हारे बीच मुख्य बाधा है। अभ्यास से जैसे ही मन स्वांसों के साथ एकाकार हो गया तो तुम चुप हो गए, सब परदे गिर गए। वही घूंघट है। भीतर तुम चर्चा किये ही जाते हो। भीतर एक क्षण भी ऐसा नहीं आता जब चर्चा बंद होती हो। तुम या तो बाहर बात करते हो और अगर बाहर कोई न मिले तो भीतर बात करते हो; लेकिन बात जारी रहती है। अभ्यास से इसे थोड़ा होशपूर्वक जांचने की कोशिश करना। यह जो भीतर वार्तालाप चल रहा है, यही पर्दा है। इसके तुम सजग हो जाना, साक्षी हो जाना, एक दूरी बनाए रखना और फिर देखना। तुम खुद नहीं कर रहे हो यह वार्तालाप, यह तुम्हारा मन कर रहा है। तुम दूर होकर देख सकते हो। तुम साक्षी हो सकते हो। जब तुम देखने वाले बन जाओगे तो धीरे-धीरे पाओगे कि भीतर का वार्तालाप बंद होने लगा। कभी-कभी बीच में अंतराल के क्षण आ जाएंगे। ध्यान अभ्यास से जैसे ही शून्य में प्रवेश होगा तो विचारों के सारे बादल हट जाएंगे और तुम्हें खाली आकाश दिखाई पड़ेगा। उसी खाली आकाश में परमानंद का अनुभव होगा। तुम बादल नहीं हो, तुम शून्य आकाश हो। बादल आते हैं, चले जाते हैं लेकिन शून्य आकाश सदा वहीं है। बादल तुम्हारा स्वभाव नहीं है, शून्य आकाश तुम्हारा स्वभाव है। जो सदा रहता है, जो कभी नहीं बदलता, वही स्वभाव है। शब्द तुम्हारा स्वभाव नहीं है, शून्यता तुम्हारा स्वभाव है। शब्द तो आते हैं, बादलों की तरह चलते जाते हैं, उठते हैं लहरों की तरह और खो जाते हैं। तुम शब्द नहीं हो। तुम्हारी पहुंच जब तक आकाश की तरफ न हो, तब तक गगन गुफा कैसे खुलेगी? तब तक कैसे झरेगा अजर अमृत? तब तक तुम कैसे डूबोगे आनंद की रसधार में और जब कोई आनंद की रसधार में डूब जाता है तो मन मस्त हो जाता है और तब क्यों बोले। जब परमात्मा का सानिध्य मिल जाता है तो परम आनंद से व्यक्ति नाचने लगता है।

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