
Rama Devi Sahu
309 days ago
।। भगवान श्रीराम के अनुसार विजय के गुण ।। संघर्ष संसार की स्वाभाविक स्थिति है और विजय प्रत्येक व्यक्ति की स्वाभाविक इच्छा है। विजय के लिए व्यक्ति अस्त्र-शस्त्रों को इकट्ठा करता है, संसाधन जुटाता है, संबंध बनाता है। युद्ध की स्थिति में विजयी होने के लिए रणनीति और कूटनीति का सहारा लिया जाता है, लेकिन क्या यही चीजें व्यक्ति को विजयी बनाने में निर्णायक होती हैं? इसका बात का उत्तर रामचरित मानस में दिया गया है। इस ग्रंथ में बात की स्थापना की गई है कि विजय प्राप्त करने के लिए धर्म और आचरण निर्णायक तत्त्व हैं। सत्ता, संसाधन और छल-छद्म से विजय नहीं मिलती। विजय के लिए आवश्यक तत्त्वों का वर्णन तुलसीदास ने भगवान राम के मुख से कराया है। भगवान राम विभीषण द्वारा पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में विजय के लिए आवश्यक तत्त्वों का विवेचन करते हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने विजय के लिए आवश्यक गुणों का वर्णन धर्मरथ के रूपक के जरिए किया है। राम- विभीषण का विजय संवाद इस प्रकार है- रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा।। अधिक प्रीति मन भा संदेहा। बंदि चरन कह सहित सनेहा।। भावार्थ- रावण रथ पर सवार होकर रणभूमि में पहुंचता है और भगवान राम बिना रथ के ही उससे लड़ने के लिए रणभूमि में चलने को तत्पर हो जाते हैं। इसे देखकर विभीषण अधीर हो जाते हैं, उनके भीतर राम की विजय के प्रति संदेह पैदा हो जाता है और वह भगवान राम से विनम्रता सहित एक प्रश्न पूछते हैं। नाथ न रथ नहि तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना।। सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना।। भावार्थ- हे नाथ! आपके पास रथ नहीं है, तन की रक्षा के लिए कवच नहीं है, आप नंगे पैर हैं। रथ पर सवार रावण को आप किस प्रकार जीत पाएंगे? इस पर कृपानिधान श्री रामजी ने कहा- हे सखे! सुनो, जिससे जय होती है, वह रथ दूसरा ही है। सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका।। बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे।। भावार्थ- जिस रथ से विजय मिलती है, शौर्य और धैर्य उसके पहिए हैं। सत्य और शील पर आधारित सद्आचरण उस रथ की ध्वजा और पताका हैं। बल, विवेक, इंद्रिय निग्रह और परोपकार रूपी चार घोड़े उस रथ को खींचते हैं, जो क्षमा, दया और समता रूपी डोरी से रथ में जुड़े रहते हैं। ईस भजनु सारथी सुजाना। बिरति चर्म संतोष कृपाना।। दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा। बर बिग्यान कठिन कोदंडा।। भावार्थ- धर्मरथ को ईश्वर का भजन रूपी चतुर सारथी संचालित करता है। इस रथ पर सवार योद्धा के लिए वैराग्य ढाल का कार्य करता है और संतोष रूपी तलवार से वह युद्ध करता है। योद्धा के लिए दान फरसा है, बुद्धि ही उसकी प्रचण्ड शक्ति है, सत्य पर आधारित उसका चिंतन ही धनुष है। अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलीमुख नाना।। कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम बिजय उपाय न दूजा।। भावार्थ- निर्मल और अचल मन ही धर्म योद्धा का तरकश है। मन पर नियंत्रण और संतुलित आहार-विहार उसके बाण हैं। विद्वान पुरुषों और गुरु के प्रति अविचल आस्था ही योद्धा के अभेद्य कवच हैं। इसके समान विजय का दूसरा उपाय नहीं है। सखा धर्ममय अस रथ जाकें। जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें।। भावार्थ- हे मित्र विभीषण! जिसके पास ऐसा धर्ममय रथ है, उसे संपूर्ण संसार में कोई भी नहीं पराजित कर सकता। विजयदशमी का पर्व सत्य की विजय का पर्व है। यह पर्व सत्य की विजय का संदेश देता है और बताता है कि धर्मयुक्त आचरण भी विजय का अमोघ अस्त्र है। भगवान राम और विभीषण का संवाद भी सत्य, धर्म और विजय को एक-दूसरे का पर्याय बताता है। असत्य के पाले में खड़ी शक्तियों से लड़ते समय यदि हम भी धर्मरथ पर सवार होने की चेष्टा करें, तो सफलता मिलनी तय है।

Comments (4)

Rama Devi Sahu
Oct 25, 2025
Prabhu Shri Ram or Bajarangi Hanuman Ji ki Aasirbad Aap pr Sadeib Bani Rahe 🙏 Aap ka Kalyan Ho 🙏🌹🌹

Rama Devi Sahu
Oct 25, 2025
Jai Shree Ram 🙏 Jai Siya Ram 🙏 Subha Shanivar ki Subha Kamanayen ke Sath Suprabhat Jii 🙏 Aap ka Din Subha Mangalmay Ho 🙏🌹🌹

neeraj
Oct 25, 2025
जय श्री राम 💐जय जय श्री राम 🙏श्री राम जय राम जय जय राम🌷🌷

neeraj
Oct 25, 2025
जय श्री राम 💐💐 जय जय श्री राम श्री राम जय राम जय जय राम
