
Rama Devi Sahu
12 days ago
विदाई पितरों की… और आगमन शक्ति का...महालया हिंदू परंपरा में कुछ तिथियाँ ऐसी हैं, जिनमें केवल पूजा-पाठ नहीं होता… उनके भीतर कोई गहरा अर्थ छिपा होता है। इस वर्ष 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या भी ऐसी ही एक तिथि है। पितृपक्ष का समापन सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा। यह वह दिन है जब हम अपने ज्ञात-अज्ञात पितरों को स्मरण करते हैं। खासकर उन पूर्वजों के लिए भी इस दिन श्राद्ध-तर्पण की परंपरा है, जिनकी मृत्यु-तिथि ज्ञात न हो या किसी कारण से उस तिथि पर श्राद्ध न हो पाया हो। इसी कारण इस अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है। कभी-कभी हम सोचते हैं कि जो लोग हमारे साथ नहीं हैं, उन्हें याद करने से क्या बदल जाएगा? शायद बहुत कुछ…क्योंकि इंसान केवल अपने वर्तमान से नहीं बनता। उसके पीछे कई पीढ़ियों की मेहनत, संस्कार, गलतियाँ, संघर्ष और आशीर्वाद खड़े होते हैं। पितृपक्ष उसी अतीत के सामने कुछ पल सिर झुकाने का समय है। पितरों के लिए क्या किया जाता है? अपनी कुल-परंपरा के अनुसार इस दिन तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान, अन्नदान और यथाशक्ति दान करने की परंपरा है। तिल और जल से तर्पण का विशेष महत्व माना गया है। श्राद्ध-विधि के प्राचीन वर्णनों में पितृकर्म के साथ दक्षिण दिशा का संबंध भी मिलता है। गरुड़ पुराण के एक श्राद्ध-विधान में पितरों को अर्पण करते समय दक्षिण की ओर देखने का उल्लेख है। पितरों को प्रसन्न करने के लिए सबसे पहले विधि की भव्यता नहीं, मन की श्रद्धा चाहिए। जो सामर्थ्य में हो, श्रद्धा से कीजिए। जो संभव न हो, उसके लिए स्वयं को दोषी मत मानिए। यही बात इस पूरे कर्मकांड को डर से निकालकर श्रद्धा और कृतज्ञता से जोड़ देती है। और फिर आती है महालया… यहीं से इस दिन का एक दूसरा और बेहद सुंदर पक्ष सामने आता है। सर्वपितृ अमावस्या को ही महालया अमावस्या भी कहा जाता है। एक तरफ पितृपक्ष अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँचता है… और दूसरी तरफ माँ दुर्गा के आगमन की प्रतीक्षा शुरू हो जाती है। धार्मिक परंपरा में ऐसी मान्यता प्रचलित है कि महालया के अवसर पर जगदंबा के पृथ्वी पर आगमन का आह्वान होता है और यहीं से देवी पक्ष तथा दुर्गापूजा के आगमन का भाव गहरा होता है। यानी एक ही समय में... पितरों को विदाई… और शक्ति का आह्वान। शायद इसी वजह से महालया केवल एक धार्मिक तिथि नहीं लगती, बल्कि अतीत और शक्ति के बीच एक सेतु जैसी महसूस होती है। और माँ दुर्गा? वह उस शक्ति का स्वरूप हैं जो अन्याय के सामने झुकती नहीं। इसीलिए महालया के दिन देवी का आह्वान केवल माँ को बुलाना नहीं है… यह अपने भीतर भी उस शक्ति को जगाने का एक सुंदर प्रतीक है, जो गलत के सामने खड़े होने का साहस देती है। और देखिए, कितना सुंदर संयोग है... 10 अक्टूबर को पितरों का स्मरण और पितृपक्ष का समापन… और 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि का आरंभ। मानो पहले हम अपनी जड़ों को प्रणाम करते हैं, फिर अपनी शक्ति को जगाते हैं। पितरों से मिली विरासत को सम्मान… और माँ से मिली शक्ति को प्रणाम। शायद महालया का यही सबसे सुंदर संदेश है...जो हमें बनाकर गए, उन्हें मत भूलिए। और जो शक्ति आपके भीतर है, उसे भी सुप्तावस्था में जाने मत दीजिए। सर्वपितृ अमावस्या पर अपने पितरों को श्रद्धापूर्वक स्मरण करें। अपनी परंपरा के अनुसार तर्पण-श्राद्ध करें और सामर्थ्य के अनुसार दान करें। क्योंकि आखिर में… ईश्वर के सामने विधि की भव्यता से ज्यादा मायने उस भाव के होते हैं, जिसके साथ हम सिर झुकाते हैं। 🌺🌿🦚🌺🌿🦚🌺 अपने पितरों को शत शत नमन 🙏🏻


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