
Rama Devi Sahu
140 days ago
राम और कृष्ण के व्यक्तित्व का यह अंतर वास्तव में मनुष्य की चेतना के विकास की यात्रा है। ● राम मर्यादा की पराकाष्ठा हैं, जो स्वयं को नियमों में बांधकर संसार को राह दिखाते हैं। • कृष्ण पूर्णता का विस्तार हैं, जो समय आने पर नियमों को मोड़कर धर्म की रक्षा करते हैं। ● राम अहिल्या का उद्धार अपने चरणों के स्पर्श से करते हैं, जो करुणा है। • कृष्ण कुब्जा का उद्धार उसे अधिकार देकर और उसके आत्मसम्मान को जगाकर करते हैं, जो सामाजिक क्रांति है। ● राम समुद्र से रास्ता मांगने के लिए तीन दिन तक अनुनय-विनय (प्रार्थना) करते हैं। • कृष्ण शिशुपाल की सौ गालियों को गिनते हैं और समय पूरा होते ही सुदर्शन उठा लेते हैं। ● राम का जीवन 'क्या होना चाहिए' (आदर्श) का दर्पण है। • कृष्ण का जीवन 'क्या हो सकता है' (संभावना) का उत्सव है। ● राम बाली को छिपकर मारने के बाद भी ग्लानि और तर्क का सामना करते हैं। • कृष्ण अधर्म के विनाश के लिए भीष्म और द्रोण जैसे महारथियों के विरुद्ध हर चाल को 'धर्म' घोषित कर देते हैं। ● राम वचनों के लिए राजपाट और सुख त्याग देते हैं। • कृष्ण सत्य की स्थापना के लिए 'रणछोड़' कहलाना भी स्वीकार कर लेते हैं। ● राम वह बीज हैं जो मिट्टी के दबाव को सहकर अंकुरित होता है। • कृष्ण वह विशाल वृक्ष हैं जो आंधियों में झुकता नहीं, बल्कि आंधियों की दिशा मोड़ देता है। ● बचपन राम जैसा निष्पाप और आज्ञाकारी होना चाहिए। • किंतु युवावस्था और संघर्ष का समय कृष्ण जैसा प्रखर और बुद्धिवान होना मांगता है। राम नैतिकता का आधार हैं, कृष्ण उस नैतिकता को बचाने का सामर्थ्य। यदि राम हमारे भीतर का 'चरित्र' हैं, तो कृष्ण हमारे भीतर की 'चेतना' हैं। संकट के समय केवल आदर्श काम नहीं आते, वहाँ कृष्ण जैसी तीक्ष्ण बुद्धि और रणनीति का होना भी उतना ही अनिवार्य है। व्यक्ति का समय पर कृष्ण होना भी आवश्यक है...

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