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तीन पग भूमि… तमिलनाडु के चिदंबरम में उलगलाँठा मंदिर में स्थित इस मूर्ति का अर्थ आपमें से बहुत लोगों को नहीं पता होगा, ये कहानी बहुत दिलचस्प है। कहानी बहुत पुरानी है और इसकी कड़ी ऋषि कश्यप से शुरू होती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कश्यप ऋषि और उनकी पत्नी दिति के वंश में हिरण्यकश्यप का जन्म हुआ। हिरण्यकश्यप का पुत्र था प्रह्लाद, जो भगवान विष्णु का महान भक्त था। प्रहलाद की कहानी होली के साथ भी जुड़ी हुई है, होलिका हिरण्यकश्यप की बहिन थी। प्रह्लाद का पुत्र था विरोचन, और विरोचन के पुत्र थे महाबली, जिन्हें “राजा बलि” भी कहा जाता है। आज भी सनातन धर्म में हाथ में कलावा (रक्षा सूत्र / मौली) बाँधते समय जो प्रसिद्ध वैदिक मंत्र बोला जाता है, उसमें भी राजा महाबली का जिक्र आता है.. वह मंत्र यह है: येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥ इसका अर्थ है कि जिस रक्षा सूत्र से महान पराक्रमी दानवों के राजा महाबली को बाँधा गया था, उसी रक्षा सूत्र से मैं तुम्हें बाँधता हूँ। हे रक्षा! तुम अडिग रहो, स्थिर रहो और इसकी रक्षा करो। यही मंत्र रक्षाबंधन, यज्ञ, पूजा, संकल्प तथा कलावा बाँधते समय सबसे अधिक प्रचलित है। महाबली अपने पूर्वज हिरण्यकश्यप से बिल्कुल अलग थे। वे एक शक्तिशाली राजा होने के साथ-साथ अपनी प्रजा के प्रति अत्यंत प्रेम रखने वाले और दानवीर राजा माने जाते थे। उनकी प्रजा सुखी और समृद्ध थी और अपने राजा से बहुत प्रेम करती थी। लेकिन महाबली की बढ़ती शक्ति से देवता चिंतित हो गए। तब भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया और एक छोटे से ब्राह्मण बालक के रूप में महाबली के यज्ञ में पहुंचे। महाबली ने वामन से पूछा "आपको क्या चाहिए?" वामन ने केवल तीन पग भूमि मांगी। महाबली ने अपना वचन दे दिया। लेकिन वामन ने विराट रूप धारण कर लिया। पहले पग में पृथ्वी और दूसरे पग में आकाश नाप लिया। अब तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान नहीं बचा। महाबली समझ गए कि उनके सामने स्वयं भगवान विष्णु हैं। उन्होंने अपना सिर झुका दिया और कहा "प्रभु, तीसरा पग मेरे सिर पर रख दीजिए।" भगवान ने उनके सिर पर अपना तीसरा पग रखा और महाबली को पाताल लोक भेज दिया। लेकिन कहानी का सबसे सुंदर हिस्सा इसके बाद आता है। भगवान विष्णु महाबली की दानशीलता, सत्यनिष्ठा और अपनी प्रजा के प्रति प्रेम से प्रसन्न हुए। महाबली ने भगवान से एक इच्छा मांगी कि "मुझे वर्ष में एक बार अपनी प्रजा से मिलने की अनुमति दीजिए।" भगवान विष्णु ने उनकी यह इच्छा स्वीकार कर ली। और यही मान्यता दक्षिण भारत, विशेषकर केरल में ओणम के त्योहार का आधार बनी। कहा जाता है कि हर वर्ष जब महाबली अपनी प्रजा से मिलने केरल आते हैं, तो उनके स्वागत में घरों को सजाया जाता है, फूलों की सुंदर रंगोली बनाई जाती है, नए वस्त्र पहने जाते हैं और तरह-तरह के व्यंजनों से सजी ओणम सद्या तैयार की जाती है। सद्या एक प्रकार की केरल की एक बहुत से व्यंजनों की थाली होती है जिसे केले के पत्ते पर परोसा जाता है। कितनी अद्भुत कल्पना है… एक राजा, जो अपनी प्रजा से इतना प्रेम करता था कि मृत्यु या लोक परिवर्तन के बाद भी उसकी सबसे बड़ी इच्छा यही थी कि वह वर्ष में एक बार अपनी प्रजा को देख सके। और प्रजा भी हर वर्ष उसी प्रेम से अपने राजा का इंतजार करती है।

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