
Rama Devi Sahu
61 days ago
असीम दिव्य दृष्टि (चका नयन): इस पंक्ति में महाप्रभु श्री जगन्नाथ जी के उन विशाल, गोल और सम्मोहक नेत्रों की महिमा गाई गई है, जिन्हें 'चका डोला' या 'चका नयन' कहा जाता है। श्री जगन्नाथ जी के ये नेत्र केवल भौतिक आँखें नहीं हैं, बल्कि वे संपूर्ण ब्रह्मांड को अपने भीतर समेटे हुए हैं। उनके नेत्रों के एक छोटे से कोने (कोर) में ही सारा संसार समाया हुआ है। इसका अर्थ यह है कि उनकी दिव्य दृष्टि से इस सृष्टि का कोई भी जीव या कोना अछूता नहीं है; वे हर पल हर किसी पर अपनी दृष्टि बनाए रखते हैं। अंतर्यामी स्वरूप (बिन बोले सब जान ले): भगवान केवल हमारे मुख से निकले शब्दों को ही नहीं सुनते, बल्कि वे हमारे मन के भीतर चल रहे विचारों, हमारी गहरी से गहरी पीड़ा, मौन प्रार्थना और हमारी सच्ची भक्ति को भी बिना कुछ कहे समझ लेते हैं। वे घट-घट वासी हैं, यानी हर हृदय की बात जानने वाले अंतर्यामी हैं। परम दयालु और आश्रयदाता (कृपा निधान): उन्हें 'कृपा निधान' कहा गया है, जिसका अर्थ है—करुणा और दया के असीम भंडार। एक भक्त को भगवान के सामने अपनी इच्छाओं या दुखों की बड़ी-बड़ी सूचियाँ रखने की आवश्यकता नहीं होती। वे इतने कृपालु हैं कि भक्त के बिना बोले ही उसकी हर जरूरत और व्याकुलता को जानकर उस पर अपनी दया बरसा देते हैं। संक्षेप में: यह दोहा पूर्ण आत्मसमर्पण और अटूट विश्वास को दर्शाता है कि जब हमारे रक्षक स्वयं श्री जगन्नाथ जी हैं, जो हमारे मौन को भी पढ़ लेते हैं और जिनके भीतर ही पूरा ब्रह्मांड वास करता है, तो हमें किसी भी बात की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।

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