
बद्रीप्रसादअसाटी
307 days ago
संत नामदेव जन्मोत्सव विशेष 〰️〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️〰️ श्री नामदेव का जन्म 26 अक्टूबर 1270 को हुआ। उनके पिता का नाम दामा सेठ और उनकी माता का नाम गोनई था। इतिहासकारो के अनुसार नामदेव का जन्म महाराष्ट्र के सातारा जिले के कराड के पास नरसी वामनी ग्राम या मराठवाडा के परभणी में हुआ था। जबकि कुछ लोगो का मानना है की उनका जन्म महाराष्ट्र के पंढरपुर में हुआ, क्योकि उनके पिता भगवान विट्ठल के भक्त थे। पंढरपुर में भगवान कृष्णा को विट्ठल के रूप में पूजा जाता है। संत नामदेवजी का महाराष्ट्र में वही स्थान है,जो भक्त कबीरजी अथवा सूरदास का उत्तरी भारत में है। उनका सारा जीवन मधुर भक्ति-भाव से ओतप्रोत था। वह संप्रदाय भक्ति की अभिव्यक्ति एवं धार्मिक व्यवस्था में जाति बंधन से मुक्ति के लिए जाने जाते हैं। नामदेव ने कई अभंग लिखे, जिनमें भगवान के प्रति उनके समर्पण की अभिव्यक्ति है। कहा जाता है कि संत नामदेव जब बहुत छोटे थे तभी से भगवान की भक्ति में डूबे रहते थे। बाल -काल में ही एक बार उनकी माता ने उन्हें भगवान विठोबा को प्रसाद चढाने के लिए दिया तो वे उसे लेकर मंदिर पहुंचे और उनके हठ के आगे भगवान को स्वयं प्रसाद ग्रहण करने आना पड़ा। संत नामदेव का संपूर्ण जीवन मानव कल्याण के लिए समर्पित रहा। मूर्ति पूजा, कर्मकांड, जातपात के विषय में उनके स्पष्ट विचारों के कारण हिन्दी के विद्वानों ने उन्हें कबीरजी का आध्यात्मिक अग्रज माना है। संत नामदेवजी ने पंजाबी में पद्य रचना भी की।भक्त नामदेवजी की बाणी में सरलता है। वह ह्रदय को बाँधे रखती है। उनके प्रभु भक्ति भरे भावों एवं विचारों का प्रभाव पंजाब के लोगों पर आज भी है। भक्त नामदेवजी के महाप्रयाण से तीन सौ साल बाद श्री गुरु अरजनदेवजी ने उनकी बाणी का संकलन श्री गुरु ग्रंथ साहिब में किया। श्री गुरु ग्रंथ साहिब में उनके 61 पद, 3 श्लोक, 18 रागों में संकलित है। वास्तव में श्री गुरु साहिब में नामदेवजी की वाणी अमृत का वह निरंतर बहता हुआ झरना है, जिसमें संपूर्ण मानवता को पवित्रता प्रदान करने का सामर्थ्य है। संत नामदेव ने मुश्किल समय में महाराष्ट्र के लोगो को एकता के सूत्र में बांधने का भी काम किया है। पंजाब के शब्द कीर्तन और महाराष्ट्र के वारकरी कीर्तन में हमें बहुत से समानताये भी दिखाई देती है। पंजाब के घुमन में उनका शहीद स्मारक भी बनवाया गया है। उनकी याद में सिक्खों द्वारा राजस्थान में उनका मंदिर भी बनवाया गया है। उनके गुरु देव ज्ञानेश्वर जी परलोक गमन कर गए तो कुछ समय उपराम रहने लग गए। अन्तिम दिनों में वे पंजाब आ गए। अन्त में उनकी अस्सी साल की आयु में जुलाई, 1350 को परलोक गमन कर गए। कोटि-कोटि नमन्। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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