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Rama Devi Sahu

32 days ago

सम्पूर्ण सृष्टि ही गुरु है – क्योंकि गुरु एक व्यक्ति नहीं, एक दृष्टि है ********************************** गुरु कोई व्यक्ति नहीं, एक तत्व है। जिस भी माध्यम से अज्ञानता का अंधकार नष्ट हो और ज्ञान की रोशनी उदित हो, वही गुरु है। हम व्यक्ति को गुरु मान सकते हैं, लेकिन गुरु किसी विशेष वेशभूषा या किसी एक व्यक्ति तक ही सीमित हो, यह आवश्यक नहीं है। गुरु वह है जो आपके अंतर्मन को झकझोर कर जगा दे, आपकी सुप्त चेतना को झंकृत कर सचेत कर दे। जीवन में सबसे बड़ा अंधकार ज्ञान का अभाव नहीं, बल्कि स्वयं को न जान पाना है। हम संसार को तो देख लेते हैं, पर स्वयं के भीतर छिपे सत्य से अनजान रह जाते हैं। गुरु वही है जो उस अज्ञान के आवरण को हटाकर आत्मबोध की यात्रा प्रारम्भ कराते हैं। गुरु हमें नया ज्ञान नहीं देता, बल्कि हमारी मिथ्या पहचान को देखने की दृष्टि देता है। वह हमें कुछ नया बनाता नहीं, बल्कि जो हम वास्तव में हैं, उसका बोध कराता है। इसलिए गुरु का कार्य केवल सिखाना नहीं, जगाना है। सच्चा गुरु हमारे प्रश्नों के उत्तर नहीं देता, बल्कि हमारी चेतना को इतना विकसित कर देता है कि उत्तर स्वयं प्रकट होने लगते हैं। वह हमारे भाग्य को नहीं बदलता, बल्कि हमारी दृष्टि बदल देता है; और जब दृष्टि बदलती है, तो पूरा जीवन बदल जाता है। इसी सत्य को भगवान दत्तात्रेय ने अपने जीवन से जीकर दिखाया। उन्होंने किसी एक व्यक्ति को ही अपना गुरु नहीं माना, बल्कि जहाँ से भी सत्य, विवेक और आत्मबोध की प्रेरणा मिली, उसे विनम्रतापूर्वक स्वीकार किया। इस प्रकार उन्होंने सम्पूर्ण सृष्टि में अपने 24 गुरु देखे। भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरु एवं उनसे प्राप्त शिक्षाएँ -( श्रीमद्भागवत महापुराण के 11 स्कन्ध / अध्याय 7, 8, 9 ) 1. पृथ्वी – धैर्य, क्षमा, सहनशीलता और निरंतर परोपकार का भाव। 2. वायु – संसार में रहते हुए भी अनासक्त और निर्लिप्त रहना। 3. आकाश – आत्मा की भाँति व्यापक, अखंड और किसी से लिप्त न होना। 4. जल – निर्मल, शीतल, मधुर और दूसरों को पवित्र करने वाला जीवन जीना। 5. अग्नि – तेजस्वी रहना, सबको स्वीकार करना, पर किसी के दोष से दूषित न होना। 6. चन्द्रमा – शरीर में परिवर्तन होते हैं, आत्मा सदा अपरिवर्तित रहती है। 7. सूर्य – ग्रहण और त्याग करते हुए भी अनासक्त रहना तथा निःस्वार्थ भाव से सबका हित करना। 8. कपोत (कबूतर) – परिवार और संबंधों में अति आसक्ति अंततः दुःख का कारण बनती है। 9. अजगर – जो सहज उपलब्ध हो, उसमें संतोष रखना; अनावश्यक भाग-दौड़ न करना। 10. समुद्र – सुख-दुःख, लाभ-हानि में समभाव और गम्भीरता बनाए रखना। 11. पतंगा – रूप और आकर्षण का मोह विनाश का कारण बन सकता है। 12. मधुमक्खी – अनेक स्रोतों से सार ग्रहण करना, पर आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना। 13. हाथी – इन्द्रिय-विकार, विशेषकर कामवासना, विवेक को नष्ट कर सकती है। 14. मधुहा (शहद एकत्र करने वाला) – संग्रह किया हुआ धन या वस्तुएँ अंततः किसी और के काम आ सकती हैं; इसलिए संग्रह के मोह से बचो। 15. हिरण – मधुर ध्वनि और इन्द्रिय-सुख का आकर्षण भी बंधन बन सकता है। 16. मछली – जिह्वा का असंयम पतन का कारण बन सकता है। 17. पिंगला – आशा और अपेक्षाओं का त्याग करते ही मन को वास्तविक शांति मिलती है। 18. कुरर पक्षी (बाज़) – त्याग करने से संघर्ष और भय दोनों समाप्त हो जाते हैं। 19. बालक – निष्कपटता, सरलता, निश्छलता और वर्तमान में जीने का भाव। 20. कुमारी कन्या – एकांत, सादगी और अनावश्यक संग से बचने का महत्व। 21. बाण बनाने वाला – गहन एकाग्रता से बाहरी विक्षेप महत्वहीन हो जाते हैं। 22. सर्प – अनावश्यक संग्रह, प्रदर्शन और स्थायी आसक्ति से दूर रहना। 23. मकड़ी – जैसे मकड़ी अपने भीतर से जाला बनाकर उसी में समेट लेती है, वैसे ही यह सृष्टि परमात्मा से उत्पन्न होकर अंततः उसी में विलीन हो जाती है। 24. भृंगी (ततैया) – जिस वस्तु, विचार या लक्ष्य का निरंतर चिंतन किया जाता है, मनुष्य धीरे-धीरे उसी के अनुरूप बन जाता है। (24 गुरूओं का वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण से लिया है) भगवान दत्तात्रेय हमें सिखाते हैं कि गुरु केवल किसी व्यक्ति का नाम नहीं, बल्कि सत्य को देखने की एक दृष्टि है। जहाँ से भी सत्य, विवेक और आत्मबोध की प्रेरणा मिले, उसे विनम्रता से स्वीकार करना ही सच्ची शिष्यता है। इस गुरु पूर्णिमा पर केवल गुरु का सम्मान ही नहीं, अपने भीतर शिष्यत्व को भी जागृत करें। अपनी दृष्टि को

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