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*त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा संनिवेश्य।* *ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान् स्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि।।* -श्वेताश्वतर उपनिषद् 2/8 बुद्धिमान् मनुष्य सिर, ग्रीवा और छाती उन्नत रखकर शरीर को सीधा स्थिर करके समस्त इन्द्रियों को मन के साथ हृदय में निरुद्ध/एकाग्र करके ॐ नौका द्वारा समस्त भयंकर संसार प्रवाहों को पार कर ले। ---------- *आ हर्यताय धृष्णवे धनुष्टन्वन्ति पौंस्यम्।* *शुक्रा वि यन्त्यसुराय निर्णिजे विपामग्रे महीयुव:।।* - सामवेद 551 जो अपना जीवन शुद्ध बनाते हैं, वे कमनीय कामादि विकारों का धर्षण करने वाले प्रभु के लिए पावन आत्मा रूप बाण वाले धनुष को खूब तानते हैं। *प्रणवो धनु: शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते।* *अप्रमत्तेन वेधव्यं शरवत्तन्मयो भवेत्।।* -मुण्डकोपनिषद् 2/4 बाण आत्मा, धनुष ॐ और लक्ष्य ब्रह्म है। स्वयं को शुद्ध बनाने वाले वे उपासक प्राणों के प्राण परमात्मा की ओर ही जाते हैं। वे अपने शोधन में समर्थ, मेधावियों में अग्रणी और भौतिक सुखों की आसक्ति से परे हो जाते हैं।

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