
Srikumar महाराज🇮🇳☸️
75 days ago
भगवान विश्वकर्म सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी के सातवें पुत्र हैं और उन्हें देव शिल्पी या देव बड़ैई के नाम से जाना जाता है। सनातन धर्म में उनका स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे निरमाण और सृजन के देवता हैं, जिन्हें दुनिया के पहले इंजीनियर और वास्तुकार के रूप में पूजा जाता है। उनका मुख्य स्थान और महत्व निम्नलिखित बिंदुओं से स्पष्ट होता है: सृष्टि रचना: मान्यताओं के अनुसार, भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की स्थापना के लिए विश्वकर्मा को जिम्मेदारी सौंपी थी। उन्होंने मेरू पर्वत को जल में स्थापित कर सृष्टि को स्थिर किया और सभी देवताओं के लिए नगर, महल, मंदिर और अस्त्र-शस्त्र निर्मित किए। पौराणिक निर्माण: पौराणिक कथाओं के अनुसार, स्वर्ण लंका, इंद्रप्रस्थ, द्वारका, और हस्तिनापुर जैसे प्रसिद्ध नगरों का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने ही किया था। साथ ही, वज्र, सुदर्शन चक्र, और त्रिशूल जैसे दिव्य अस्त्रों का निर्माण भी उनके द्वारा ही हुआ है। कर्मी और शिल्पियों का आराध्य: वे कर्म के प्रतीक हैं और शिल्प, वास्तुकला, इंजीनियरिंग और हस्तशिल्प के आदि प्रवर्तक माने जाते हैं। इसलिए, कारीगर, इंजीनियर, मजदूर और व्यवसायी उन्हें अपने आराध्य देव मानते हैं और विश्वकर्मा जयंती (कन्या संक्रांति) पर उनके और अपने औजारों/मशीनों की पूजा करते हैं। पांच पुत्र एवं शिल्प शाखाएं: भगवान विश्वकर्मा के पांच पुत्र थे—मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और देवज्ञ—जो क्रमशः लोहा, लकड़ी, तांबा, पत्थर और सोने के शिल्प के आदिपुरुष माने जाते हैं।

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