
बद्रीप्रसादअसाटी
304 days ago
🚩🕉️🚩🕉️🚩🕉️🚩🕉️🚩🕉️ *🚩🕉️भाग - 02🚩🕉️* *🚩🕉️कर्म प्रधान विश्व रचि राखा।* *🚩🕉️जो जस कीन सो तस फल चाखा ।।* 🚩🕉️🚩🕉️🚩🕉️🚩🕉️🚩🕉️ *🚩🕉️‘कर्म प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस कीन सो तस फल चाखा’ — यह प्रसिद्ध दोहा गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित ‘रामचरितमानस’ की चौपाई है, जिसमें मानव जीवन एवं सृष्टि के संचालन में ‘कर्म’ के सर्वोपरि महत्व को रेखांकित किया गया है।* *🚩🕉️धार्मिक ग्रंथों, मुख्यतः वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत और श्रीमद्भगवद्गीता में भी कर्म के विधान को मूल नीतिगत आधार के रूप में प्रस्तुत किया गया है। प्रस्तुत लेख में इसी सिद्धांत पर सन्दर्भों के साथ विचार किया गया है।कर्म की प्रधानता: शास्त्रीय आधारहिन्दू धर्म में ‘कर्म’ अर्थात् कार्य, आचरण या कृत्य को ही सृष्टि का मूल आधार माना गया है।* *🚩🕉️‘रामचरितमानस’ में स्पष्ट कहा गया है:“कर्म प्रधान विश्व रचि राखा।* *जो जस करहि सो तस फल चाखा॥”* *— (रामचरितमानस, अरण्य कांड) - अर्थात् यह सम्पूर्ण जगत कर्म की प्रधानता के बल पर टिका है; हर व्यक्ति या प्राणी जैसे कर्म करता है, उसे वैसे ही परिणाम भोगने पड़ते हैं। सभी प्राप्ति या हानि का मूल कारण स्वयं के कर्म हैं।* *🚩🕉️गीता में कर्म का संदेश* *🚩🕉️भगवद्गीता (अध्याय 2, श्लोक 47) में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा —“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।* *मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥”अर्थ — तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। तू कर्म के फल का हेतु मत हो और न कर्म न करने में ही तेरी प्रवृत्ति हो।* *🚩🕉️गीता में ‘कर्म’ को जीवन की धुरी, मानव के उत्कर्ष, सृष्टि की गतिशीलता और मुक्ति (मोक्ष) का मार्ग बताया गया है। फल की प्राप्ति कैसी होगी यह पूरी तरह हमारे कर्म पर निर्भर करता है, न कि केवल भाग्य अथवा ईश्वर की कृपा पर।* *🚩🕉️अन्य धार्मिक ग्रंथों व सन्दर्भबृहदारण्यक उपनिषद में कहा गया है: “जैसा कर्म करेगा, वैसा ही फल उसे मिलेगा। अच्छा कर्म करने पर अच्छा, बुरा पर बुरा फल भोगना निश्चित है।”शास्त्रों में कर्म-सिद्धांत को ‘कारण-परिणाम’ की तरह प्रतिपादित किया गया है; पृथ्वी के 84 लाख योनियों में आत्मा को पुनर्जन्म का फल भी उसके पूर्व-कर्मों पर ही निर्भर है।* *🚩🕉️श्रीरामचरितमानस में ही आगे स्पष्ट किया गया“-- सकल पदारथ हैं जग मांही।कर्महीन नर पावत नाहीं॥” यानी जो कर्महीन है, उसे संसार के कोई पदार्थ नहीं मिल सकते; कर्म ही जीवन की न्यूनतम शर्त है।* *🚩🕉️व्यवहारिक और नैतिक दृष्टिकोण‘जो जस कीन सो तस फल चाखा’ — यह विचार केवल धार्मिक विश्लेषण तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यवहारिक दृष्टि से भी सही ठहरता है। वैज्ञानिक अथवा नास्तिक भी ‘कार्य-कारण’ के नियम को जीवन में स्वीकार करते हैं; जैसा बीज बोया जायेगा, वैसा ही वृक्ष और फल भी मिलेगा।* *🚩🕉️मनुष्य स्वयं अपने जीवन की दशा व दिशा का निर्माता अपनी गतिविधियों और आचरण् के आधार पर बनता है। पाप, अत्याचार, अन्याय, धोखा — इनका फल कभी-न-कभी व्यक्ति को भुगतना ही पड़ता है।* *🚩🕉️कर्म का सार्वभौमिक विधानकर्म का यह सिद्धांत सनातन, अटल व सर्वमान्य है। यह निश्चित व सार्वकालिक है कि जो जैसा कर्म करेगा, उसे वैसा ही भाग्य प्राप्त होगा; इस नियम से न धर्म विरुद्ध कोई बच सकता है, न अधार्मिक। धर्म वास्तविक रूप में जीवन को सन्मार्ग पर चलने के लिए संकेत करता है; पाप से बचाकर, पुण्य में प्रवृत्त कराता है। अतः, हमें अपने कर्मों का निरंतर निरीक्षण करना चाहिये और हर परिस्थिति में सद्कर्म का ही चयन करना चाहिए, क्यूंकि यही प्ल, पुनर्जन्म और मुक्ति का आधार है।* *🚩🕉️समाप्त🚩🕉️* 🚩🕉️🚩🕉️🚩🕉️🚩🕉️🚩🕉️

Comments (0)
No comments yet. Be the first to comment!
