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Rama Devi Sahu

190 days ago

#रामायण में बहुत-सी ऐसी सुनी-अनसुनी गाथाएँ हैं, जो हमें सामान्य रूप में सुनने को नहीं मिलतीं। ये कथाएँ केवल युद्ध या विजय की नहीं हैं, बल्कि रिश्तों, मर्यादा और स्वभाव की हैं। ऐसी ही एक कथा उस समय की है, जब रावण-वध के बाद प्रभु श्रीराम अयोध्या लौटे थे। रावण वध के बाद जब अयोध्या में खुशियों का समंदर उमड़ रहा था, तभी एक ऐसा पत्र आया जिसने पूरी वानर सेना को धर्मसंकट में डाल दिया। क्या प्रभु राम अपनी सेना को ससुराल ले जाने से कतरा रहे थे? पढ़िए इस पूरी कथा का भावुक पहला भाग... अयोध्या की गलियां अभी रावण विजय के जश्न से थकी भी नहीं थीं कि मिथिला नरेश राजा जनक का एक दूत संदेश लेकर सभा में उपस्थित हुआ। चारों तरफ जय-जयकार हो रही थी। प्रभु श्री राम सिंहासन पर विराजमान थे। राम जी ने मुस्कुराकर कहा— प्रिय हनुमान! जरा पढ़कर तो सुनाओ, हमारे ससुर जी ने मिथिला से क्या संदेश भेजा है? हनुमान जी ने जैसे ही पत्र खोला, उनकी आंखों में चमक आ गई। पत्र में राजा जनक के शब्द नहीं, बल्कि एक पिता और एक ससुर का अगाध प्रेम छलक रहा था। पत्र में लिखा था— हे रघुनंदन! चौदह वर्षों के लंबे वनवास के बाद आप लौटे हैं। आप तो जनकपुर के प्राण हैं ही, पर हमारी लाली (सीता) तो हमारा जीवन है। पूरा मिथिलांचल आप दोनों के स्वागत के लिए पलकें बिछाए बैठा है। हमारी इच्छा है कि आप अपने तीनों भाइयों, बहुओं और अपनी उस महान वानर सेना के साथ कुछ दिन यहां विश्राम करें। हमें सेवा का एक अवसर प्रदान करें। जैसे ही हनुमान जी ने पूरी सेना शब्द पढ़ा, सभा में बैठे वानर खुशी से पागल हो गए! सुग्रीव, अंगद और बाकी वानर आपस में कानाफूसी करने लगे— भाई! अब आएगा असली मजा। रावण की सेना से लड़ते-लड़ते हड्डियां दुख गई हैं, अब जनकपुर में शरीर की सेवा होगी और गर्मागर्म मालपुए खाने को मिलेंगे! हमने सुना है कि राम जी की बारात में बहुत ठाट-बाट था, इस बार हम खुद देखेंगे। लेकिन, खुशियों के इस शोर के बीच प्रभु राम का चेहरा गंभीर हो गया प्रभु राम ने अपना हाथ उठाया और सबको शांत करते हुए बोले— सुनो भाइयों! जनकपुर मेरी ससुराल है। और दुनिया में कहीं भी नाक कट जाए तो दुख नहीं होता, पर ससुराल में नाक ऊंची रहनी चाहिए। हमने तय किया है कि हम जाएंगे, भरत-लक्ष्मण-शत्रुघ्न जाएंगे, चारों बहुएं जाएंगी और जामवंत जी-हनुमान जी जैसे वरिष्ठ लोग साथ चलेंगे। बाकी सेना यहीं सरयू तट पर रुककर विश्राम करे। यह सुनते ही जैसे करोड़ों वानरों के दिल टूट गए। सन्नाटा ऐसा कि सुई भी गिरे तो आवाज आ जाए। वानरों ने धीरे से अपना सिर नीचे झुका लिया। उनकी आंखों से टप-टप आंसू गिरने लगे। एक वानर धीरे से बुदबुदाया— प्रभु! जब लंका में रावण के राक्षसों से मरना-मारना था, तब हम वनवासी आपके अपने थे। तब आपको हमारी नाक की फिक्र नहीं थी? और आज जब मिथिला में फल-फूल और मेवा खाने का समय आया, तो हम आपके लिए नाक कटवाने वाले हो गए? क्या हमारा प्यार सिर्फ युद्ध तक ही था? राम जी ने समझाया— भाइयों, तुम कहीं भी उछल-कूद करते हो, किसी का भी फल छीन लेते हो, कहीं भी मर्यादा भूल जाते हो। वहां जनकपुर के लोग क्या कहेंगे कि राम की सेना कैसी है? अयोध्या में तुम जो चाहो करो, यहां सब अपने हैं, लेकिन वहां संकोच होगा। राम जी अपनी घोषणा करके चले गए, और पीछे छोड़ गए करोड़ों उदास चेहरे। वानर जमीन पर बैठकर पत्थर की मूरत बन गए। क्या वाकई उनकी भक्ति का सिला यही था? आगे क्या होगा? क्या जामवंत जी वानरों का यह दुख सह पाएंगे? क्या वे प्रभु राम को मनाने में सफल होंगे? कल कथा के दूसरे में भाग में जानेंगे— जामवंत जी की वो गारंटी जिसने सब कुछ बदल दिया! यदि आपको यह लेख रुचिकर लगा हो तो कमेंट में जय श्री राम लिख कर अपने मित्रों और सभी बंधु जनों के साथ अवश्य साझा करें। 🌞🚩🚩 ' ll जय श्री राम ll ' 🚩🚩🌞

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