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Rama Devi Sahu

196 days ago

ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात् प्राचीन इतिहास पर दृष्टिपात करने से प्रतीत होता है कि अनेक महापुरुषों को भी धर्म की स्थूल मर्यादाओं का उल्लंघन करना पड़ता है। लोक-हित, धर्म-वृद्धि और अधर्मनाश की सद्भावना के कारण उन्हें वैसा पापी नहीं बनना पड़ा जैसे कि वही काम करने वाले आदमी को साधारणतः बनना पड़ता है। भगवान् विष्णु ने भस्मासुर से शंकर जी के प्राण बचाने के लिये मोहनी रूप बनाकर उसे छला और नष्ट किया। समुद्रमन्थन के समय अमृत-घट के बंटवारे में जब देवताओं और असुरों में झगड़ा हो रहा था तब भी विष्णु ने माया - मोहिनी रूप बनाकर असुरों को धोखे में रखा और अमृत देवताओं को पिला दिया। सती वृन्दा का सतीत्व डिगाने के लिए भगवान् ने जालन्धर का रूप बनाया था। राजा बलि को छलने के लिए बामन का रूप धारण किया था। पेड़ की आड़ में छिपकर राम अनुचित रूप से बाली को मारा था। महाभारत में धर्मराज युधिष्ठिर ने अश्वत्थामा की मृत्यु का छलपूर्वक समर्थन किया। अर्जुन ने शिखण्डी की ओट में खड़े होकर भीष्म को मारा, कर्ण का रथ कीचड़ में गढ़ जाने पर भी उसका बध किया। घोर दुर्भिक्ष में क्षुधापीड़ित होने पर विश्वामित्र ऋषि ने चाण्डाल. के घर से कुत्ते का माँस लाकर खाया। प्रहलाद का पिता की आज्ञा को उल्लंघन करना, विभीषण का भाई को त्यागना, भरत का माता की भर्त्सना करना, बलि का गुरु शुक्राचार्य की आज्ञा न मानना, गोपियों का परपुरुष श्रीकृष्ण से प्रेम करना, मीरा का अपने पति को त्याग देना, परशुरामजी का अपनी माता का सिर काट देना आदि कार्य साधारणतः अधर्म प्रतीत होते हैं, पर इनके कर्ताओं ने सद्उद्देश्य से प्रेरित होकर किया था इसलिये धर्म की सूक्ष्म दृष्टि से यह कार्य पातक नहीं गिने गये। शिवाजी ने अफजलखाँ का बध कूटनीतिक चातुर्य से किया था। भारतीय स्वाधीनता के इतिहास में क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश सरकार के साथ जिस नीति को अपनाया था उसमें चोरी, डकैती, जासूसी, हत्या, कत्ल, झूठ बोलना, छल, विश्वासघात आदि ऐसे सभी कार्यों का समावेश हुआ था, जो मोटे तौर से अधर्म कहे जाते हैं। परन्तु उनकी आत्मा पवित्र थी, असंख्य दीन दुखी प्रजा की करुणाजनक स्थिति से द्रवित होकर अन्यायी शासकों को उलटने के लिए ही उन्होंने ऐसा किया था। कानून उन्हें भले ही अपराधी बतावे पर वस्तुतः थे कदापि पापी नहीं कहे जा सकते। अधर्म का नाश और धर्म की रक्षा के लिए भगवान् को युग-युग में अवतार लेकर अगणित हत्यायें करनी पड़ती हैं और रक्त की धार बहानी पड़ती है। इसमें पाप नहीं होता। सद्उद्देश्य के लिए किया हुआ अनुचित कार्य भी उचित के समान ही उत्तम माना गया है। इस प्रकार मजबूर किये गये सताये गये, विधुक्षित, संत्रस्त, दुखी, उत्तेजित, आपत्तिग्रस्त अथवा अज्ञानी बालक, रोगी, पागल कोई अनुचित कार्य कर बैठते हैं, तो वह क्षम्य माने जाते हैं, कारण यह है उस मनोभूमि का मनुष्य, धर्म और कर्तव्य के दृष्टिकोण से किसी बात पर ठीक विचार करने में समर्थ नहीं होता। गायत्री महाविज्ञान - युगऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य

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Comments (5)

Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

Mar 7, 2026

🙏‼️ Om Bhurbhavah Swah Tatshaviturvareninum Bhargo Devasya Dheemahi Dhiyo yo nah Prachodayat ‼️🙏

Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

Mar 7, 2026

Maa ki Aasirbad Aap pr Sadeib Bani Rahe ❤️ Aap ka Har Pal Subha Mangalmay Ho 🌹 Aap ka Ratri Sukhd or Mangalmay Ho Shubha Ratri 🌹🌹

Bajra Singh Chouhah  Bajra Singh Chouhah

Bajra Singh Chouhah Bajra Singh Chouhah

Mar 7, 2026

जय मां गायत्री सभी को पवित्र रखो 🌹