
Rama Devi Sahu
212 days ago
"नरसी मेहता का भात" 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ नानी बाई ने (मायरा) भात भरने के लिए नरसी जी को बुलाया. नरसी जी के पास भात भरने के लिए कुछ नहीं था. वह निर्धन थे लेकिन भगवन की भक्ति का खजाना भरपूर था. वो कहते थे कि -हम्हे अपनी चिंता कियो करनी, हमारी चिंता करने के लिए भगवान बैठे हैं। जब नरसी जी के पास भात का सन्देश आया तो सामानों की लिस्ट देखकर चिंतित हो उठे और आर्त भाव से अपने भगवान को पुकारा - “हे साँवरिया सेठ! हे गिरधारी ! नरसी मेहता को तो कोई नहीं जाने, तुमको जाने है संसार, चिट्ठी मेरी आई है सावंर सरकार.” सुलोचना बाई नानी बाई की पुत्री थी, सुलोचना बाई का विवाह जब तय हुआ था; तब नानी बाई के ससुराल वालों ने यह सोचा कि नरसी एक गरीब व्यक्ति है तो वह शादी के लिये भात नहीं भर पायेगा, उनको लगा कि अगर वह साधुओं की टोली को लेकर पहुँचे तो उनकी बहुत बदनामी हो जायेगी, इसलिये उन्होंने एक बहुत लम्बी सूची भात के सामान की बनाई ! उस सूची में करोड़ों का सामान लिख दिया गया जिससे कि नरसी उस सूची को देखकर खुद ही न आये। नरसी जी को निमंत्रण भेजा गया ! साथ ही मायरा भरने की सूची भी भेजी गई , परन्तु नरसी के पास केवल एक चीज़ थी वह थी श्री कृष्ण की भक्ति, इसलिये वे उन पर भरोसा करते हुए अपने संतों की टोली के साथ सुलोचना बाई को आर्शिवाद देने के लिये अंजार नगर पहुँच गये, उन्हें आता देख नानी बाई के ससुराल वाले भड़क गये और उनका अपमान करने लगे, अपने इस अपमान से नरसी जी व्यथित हो गये और रोते हुए श्री कृष्ण को याद करने लगे, नानी बाई भी अपने पिता के इस अपमान को बर्दाश्त नहीं कर पाई और आत्महत्या करने दौड़ पड़ी ! परन्तु श्री कृष्ण ने नानी बाई को रोक दिया और उसे यह कहा कि कल वह स्वयं नरसी के साथ मायरा भरने के लिये आयेंगे। बारह घंटे हुई स्वर्ण वर्षा 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ दूसरे दिन नानी बाई बड़ी ही उत्सुकता के साथ श्री कृष्ण और नरसी जी का इंतज़ार करने लगी! और तभी सामने देखती है कि नरसी जी संतों की टोली और कृष्ण जी के साथ चले आ रहे हैं और उनके पीछे ऊँटों और घोड़ों की लम्बी कतार आ रही है जिनमें सामान लदा हुआ है, दूर तक बैलगाड़ियाँ ही बैलगाड़ियाँ नज़र आ रही थी, ऐसा मायरा न अभी तक किसी ने देखा था न ही देखेगा! यह सब देखकर ससुराल वाले अपने किये पर पछताने लगे, उनके लोभ को भरने के लिये द्वारिकाधीश ने बारह घण्टे तक स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा की, नानी बाई के ससुराल वाले उस सेठ को देखते ही रहे और सोचने लगे कि कौन है ये सेठ और ये क्यों नरसी जी की मदद कर रहा है, जब उनसे रहा न गया तो उन्होंने पूछा कि कृपा करके अपना परिचय दीजिये और आप क्यों नरसी जी की सहायता कर रहे हैं। भक्त के बस में हैं भगवान 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ उनके इस प्रश्न के उत्तर में जो जवाब सेठ ने दिया, वही इस कथा का सम्पूर्ण सार है ! तथा इस प्रसंग का केन्द्र भी है, इस उत्तर के बाद सारे प्रश्न अपने आप ही समाप्त हो जाते हैं, सेठ जी का उत्तर था ... ’मैं नरसी जी का सेवक हूँ ! इनका अधिकार चलता है मुझपर ! जब कभी भी ये मुझे पुकारते हैं , मैं दौड़ा चला आता हूँ इनके पास, ! जो ये चाहते हैं; मैं वही करता हूँ ! इनके कहे कार्य को पूर्ण करना ही मेरा कर्तव्य है।" ये उत्तर सुनकर सभी हैरान रह गये और किसी के समझ में कुछ नहीं आ रहा था ! बस नानी बाई ही समझती थी कि उसके पिता की भक्ति के कारण ही श्री कृष्ण उससे बंध गये हैं , और उनका दुख अब देख नहीं पा रहे हैं इसलिये मायरा भरने के लिये स्वयं ही आ गये हैं, इससे यही साबित होता है कि भगवान केवल अपने भक्तों के वश में होते हैं। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

Comments (2)

Rama Devi Sahu
Jan 30, 2026
🙏‼️ Jai Shree Krishna 🙏 Subha Sakal ka Subha Abhinandan ‼️🙏

Shree Chand Bhura Bhura
Jan 30, 2026
सांवरिया सेठ की जय।
