
बद्रीप्रसादअसाटी
299 days ago
प्राकृतिक और कर्म 💐💐💐💐💐💐 प्राकृतिक किसी की अधीनता स्वीकार नही करती है । प्राकृतिक अपने मूल स्वभाव के अनुसार कार्य करती रहती है । अतः यथाकाल मनुष्य और अन्य जीव भी प्राकृतिक जन्य स्वभाव के अनुरूप कार्य करते है । जो कर्म बनते है और परिणामस्वरूप नवीन विचारधाराओ और कर्म की उत्पति होती रहती है । 🌹💐🌹💐 प्राकृतिक के मूल स्वभाव से मन जन्म लेता है और जीवो को कर्म के लिए आवश्यक कदम उठाने के लिए विवश कर देता है । सकंल्प और विकल्प बन ते बिगडते रहते है ।मन और बुद्धि परिस्थिति वश निर्णय लेते है । यह अवसर, और व्यक्तिगत क्षमता, साधन,परिश्रम, लगन का मिला जुला कर्म और परिणाम बनता है । 🌹💐🌹💐 प्राकृतिक मन,बुद्धि-विवेक, संस्कार, विचार, व्यवहार, कर्म,पूजा-पाठ, एक निरंतर प्रक्रिया है जो सूक्ष्म है और परिवर्तन शील है जय श्रीकृष्ण 🙏🙏🌹🌹🙏🙏

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