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Rama Devi Sahu

67 days ago

गंगा किनारे बसे एक छोटे से गांव में हरिनाथ नाम का एक वृद्ध भक्त रहता था। उसकी पूरी जिंदगी मां गंगा की भक्ति में बीती थी। सुबह सूरज निकलने से पहले वह उठ जाता, मिट्टी का दीपक जलाता और हाथ जोड़कर कहता, “हे मां गंगे, जब मेरा अंतिम समय आए तो बस एक कृपा करना… मेरी अंतिम यात्रा आपके पवित्र तट पर हो।” गांव वाले उसकी भक्ति देखकर भावुक हो जाते थे। कोई उसे पागल कहता, कोई संत। लेकिन हरिनाथ के लिए मां गंगा केवल एक नदी नहीं थीं, बल्कि उसकी मां थीं, उसकी शरण थीं। समय बीतता गया। हरिनाथ बूढ़ा हो गया। उसका शरीर कमजोर पड़ने लगा। आंखों की रोशनी धुंधली हो गई और कदम कांपने लगे। अब वह गंगा स्नान करने भी नहीं जा पाता था। फिर भी हर सुबह अपनी टूटी हुई चौकी पर बैठकर दूर बहती गंगा की दिशा में प्रणाम करता और कहता, “मां, अब शायद मैं आपके दर्शन करने नहीं आ पाऊंगा… लेकिन जब प्राण निकलें, तब मुझे अपने पास बुला लेना।” उसकी आवाज सुनकर गांव के लोग भी भावुक हो जाते थे। एक वर्ष गांव में भयंकर सूखा पड़ गया। खेत सूख गए, कुएं खाली हो गए और नदी-नाले भी शांत पड़ गए। उसी समय हरिनाथ की तबीयत अचानक बहुत बिगड़ गई। वैद्य ने गांव वालों से कहा, “अब इनके पास ज्यादा समय नहीं है।” यह सुनते ही हरिनाथ की आंखों में आंसू आ गए। उसने कांपते हुए हाथ जोड़कर कहा, “हे मां गंगे… बस एक बार अपने तट पर बुला लो। मेरी अंतिम इच्छा अधूरी मत रहने देना।” गांव वाले परेशान हो गए। गंगा गांव से कई कोस दूर थी। बूढ़े हरिनाथ को वहां तक ले जाना असंभव था। रास्ते कठिन थे और उसका शरीर इतना कमजोर हो चुका था कि वह यात्रा सहन नहीं कर सकता था। कुछ लोगों ने कहा, “अब जो होना होगा, यहीं होगा।” लेकिन हरिनाथ की आंखें अब भी गंगा की दिशा में लगी हुई थीं। उसके होंठ लगातार मां गंगा का नाम जप रहे थे। उस रात आसमान अचानक बदलने लगा। तेज हवाएं चलने लगीं। बादलों की गर्जना से पूरा गांव कांप उठा। गांव वालों ने सोचा कोई बड़ा तूफान आने वाला है। तभी दूर से पानी के बहने की भयानक आवाज सुनाई दी। लोग डरकर अपने घरों से बाहर निकले। उन्होंने देखा कि सूखी धरती के बीच अचानक एक जलधारा गांव की ओर बढ़ती चली आ रही है। वह कोई साधारण पानी नहीं था। उसमें अद्भुत चमक थी, मानो चांदनी स्वयं जल बनकर बह रही हो। कुछ ही क्षणों में वह जलधारा हरिनाथ की झोपड़ी तक पहुंच गई। गांव वाले आश्चर्य से देखते रह गए। हरिनाथ ने जैसे ही उस जल को देखा, उसकी आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगी। उसने कांपते हुए हाथ उस पवित्र जल में डुबो दिए और रोते हुए बोला, “मां… तुम खुद मेरे पास आ गई…” पूरा वातावरण “हर हर गंगे” के जयकारों से गूंज उठा। तभी एक अद्भुत सुगंध पूरे गांव में फैल गई। हरिनाथ के चेहरे पर अद्भुत शांति दिखाई देने लगी। उसने गंगा जल अपने माथे से लगाया और अंतिम बार मुस्कुराकर कहा, “अब मुझे कोई दुख नहीं… मेरी मां मुझे लेने आ गई है…” इतना कहकर उसने शांत भाव से अपने प्राण त्याग दिए। उसके चेहरे पर ऐसी दिव्य मुस्कान थी, जैसी किसी छोटे बच्चे को अपनी मां की गोद मिल गई हो। अगली सुबह गांव वालों ने देखा कि जहां तक वह जलधारा आई थी, वहां की सूखी धरती हरी हो चुकी थी। लोग समझ गए कि यह कोई साधारण घटना नहीं थी। स्वयं मां गंगा अपने भक्त की अंतिम इच्छा पूरी करने गांव तक आई थीं। उस दिन से गांव के लोग हरिनाथ की झोपड़ी वाले स्थान को पवित्र मानने लगे। वहां आने वाला हर व्यक्ति यही कहता था कि सच्ची भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती। कहते हैं आज भी उस गांव में जब कोई सच्चे मन से मां गंगा को पुकारता है, तो रात के सन्नाटे में जल की धीमी कलकल सुनाई देती है। मानो मां गंगा आज भी अपने भक्तों की पुकार सुन रही हों। क्योंकि मां अपने सच्चे बच्चों को कभी नहीं भूलती। अगर आप भी मां गंगा पर विश्वास करते हैं, तो सच्चे मन से लिखिए — हर हर गंगे।

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Pannalal panchal

Pannalal panchal

Jun 28, 2026

ॐ नमो नारायण