
Rama Devi Sahu
11 days ago
देवराज इंद्र के पास स्वर्ग का सिंहासन था, अरावत हाथी था और करोड़ों देवताओं की सेना थी... फिर भी एक राक्षस को मारने के लिए उन्हें एक जीवित संन्यासी से उसकी रीढ़ की हड्डी क्यों मांगनी पड़ी? स्वर्ग पर अब तक का सबसे बड़ा संकट मंडरा रहा था। 'वृत्रासुर' नाम के एक दैत्य ने देवताओं को धूल चटाकर स्वर्ग के सिंहासन पर कब्जा कर लिया था कारण? ब्रह्मा जी का एक ऐसा वरदान, जिसने वृत्रासुर को अमर जैसा बना दिया था:उसे न कोई लोहे की तलवार काट सकती थी, न सोने-चांदी का बाण न कोई पत्थर की शिला उसे फोड़ सकती थी, न लकड़ी का गदा न सूखा अस्त्र उस पर असर करता, न गीला अस्त्र देवताओं के सारे दिव्य अस्त्र उसके शरीर से टकराकर तिनके की तरह बिखर जाते थे। लाचार होकर देवराज इंद्र हाथ जोड़े भगवान विष्णु के पास पहुँचे—"प्रभु, जो अस्त्र धातु, पत्थर या लकड़ी का न हो, उससे भला युद्ध कैसे लड़ा जाए?" भगवान विष्णु ने मुस्कुराते हुए एक ऐसा रहस्य खोला जिसने इंद्र के रोंगटे खड़े कर दिए: इंद्र, इस ब्रह्मांड में केवल एक ही वस्तु है जो धातु या लकड़ी न होकर भी लोहे से लाख गुना कठोर है—वह है एक सिद्ध तपस्वी की तपोमय अस्थियाँ (हड्डियाँ)। नैमिषारण्य जाओ, महर्षि दधीचि से उनकी रीढ़ की हड्डी मांगो इंद्र थर-थर कांप उठे। किसी जीवित ऋषि के आश्रम जाकर यह कहना कि 'हमें आपकी हड्डियाँ चाहिए ताकि हम हथियार बना सकें'—यह किसी याचक के लिए सबसे बड़ी परीक्षा थी इंद्र लज्जित होकर महर्षि दधीचि के चरणों में गिर पड़े और कांपते होठों से वृत्रासुर के आतंक और अपनी क्रूर मांग को सामने रखा। इंद्र को लगा था कि ऋषि क्रोध में आकर उन्हें भस्म कर देंगे या आश्रम से बाहर निकाल देंगे। परंतु महर्षि दधीचि के चेहरे पर न क्रोध आया, न भय। उनके होठों पर एक शांत और दिव्य मुस्कान खिल उठी। उन्होंने इंद्र की ओर देखकर कहा:इंद्र, तुम इतने लज्जित क्यों हो? यह हाड़-मांस की देह तो कल मिट्टी में मिलकर राख हो जाएगी। यदि इस नश्वर शरीर की हड्डियाँ भी धर्म और निर्दोषों की रक्षा के काम आ जाएं, तो एक संन्यासी के लिए इससे बड़ा मोक्ष क्या होगा?बिना एक पल का संकोच किए, महर्षि दधीचि पद्मासन में बैठे, अपनी आँखें बंद कीं और योग-समाधि के बल पर अपने प्राणों को सहस्रार चक्र से ब्रह्मांड में विलीन कर दिया। देवशिल्पी विश्वकर्मा ने उनकी रीढ़ की हड्डी से त्रिलोक का सबसे भयानक अस्त्र बनाया—'वज्र' रणभूमि में जब वृत्रासुर के सामने इंद्र ने उस वज्र को चमकाया, तो वृत्रासुर हंस पड़ा—"तूने किसी धातु का अस्त्र छोड़ा तो मैं वैसे ही नहीं मरूँगा!" परंतु जैसे ही वह वज्र उसकी छाती से टकराया, वृत्रासुर का अहंकार चूर-चूर हो गया। वह अस्त्र किसी धातु का नहीं, बल्कि सत्य, तप और जीवित बलिदान से सिंचित अस्थि का था। !! जय श्री कृष्णा।।

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