
Rama Devi Sahu
2 days ago
जन्माष्टमी की रात 12 बजे आखिर खीरे का डंठल क्यों काटते हैं? इसके पीछे छिपी श्रीकृष्ण जन्म की ऐसी परंपरा, जिसे आज भी कई घरों में निभाया जाता है… दरअसल, कई परिवारों में जन्माष्टमी के दिन डंठल वाला खीरा भगवान कृष्ण के जन्म का एक प्रतीक माना जाता है। इस परंपरा में खीरे को माता के गर्भ का प्रतीक और उससे जुड़े डंठल को गर्भनाल का प्रतीक माना जाता है। आधी रात जब भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मनाया जाता है, उसी समय खीरे का डंठल अलग किया जाता है। इसे प्रतीकात्मक रूप से उस क्षण से जोड़ा जाता है जब एक शिशु जन्म लेकर अपनी माता के गर्भ से बाहर आता है और गर्भनाल से अलग होता है। यानी खीरा काटना केवल खीरा काटना नहीं माना जाता… यह कई परिवारों में श्रीकृष्ण के जन्म को प्रतीकात्मक रूप से अपने घर में जीवंत करने की एक लोकपरंपरा है। लेकिन सवाल यह है— आखिर भगवान कृष्ण के जन्म और इस साधारण से खीरे का संबंध कैसे बना? इस परंपरा को समझने के लिए हमें वापस चलना होगा द्वापर युग की उस रात में… मथुरा नगरी में कंस का अत्याचार बढ़ चुका था। एक दिन कंस को आकाशवाणी हुई कि उसकी बहन देवकी की आठवीं संतान ही उसके विनाश का कारण बनेगी। भविष्यवाणी सुनते ही कंस भयभीत हो गया। उसने देवकी और उनके पति वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया। समय बीतता गया। देवकी की एक-एक संतान का जन्म हुआ और कंस ने उन्हें निर्दयता से मार डाला। लेकिन कंस को जिस आठवीं संतान का भय था, उसका जन्म अभी बाकी था। फिर आई वह अद्भुत रात… आकाश में अंधकार था। मथुरा शांत थी। और कारागार के भीतर देवकी अपने आठवें पुत्र के जन्म की प्रतीक्षा कर रही थीं। आधी रात का समय हुआ। इसी समय भगवान श्रीकृष्ण ने देवकी के गर्भ से जन्म लिया। सनातन परंपरा में इस क्षण को भगवान विष्णु के श्रीकृष्ण रूप में अवतरण के रूप में देखा जाता है। कहा जाता है कि भगवान के प्रकट होते ही कारागार का वातावरण दिव्य हो गया। वसुदेव और देवकी ने भगवान के दिव्य स्वरूप के दर्शन किए। इसके बाद भगवान ने उन्हें आश्वस्त किया और बाल रूप धारण किया। अब सबसे बड़ी समस्या थी— कंस को इस जन्म की खबर न हो। वसुदेव जी ने बालक कृष्ण को एक टोकरी में रखा और उन्हें लेकर गोकुल की ओर चल पड़े। कारागार के द्वार खुल गए। पहरेदार निद्रा में चले गए। और वसुदेव जी आधी रात को बालक कृष्ण को लेकर यमुना की ओर निकल पड़े। यमुना का जल उस समय तेज था। लेकिन वसुदेव जी अपने सिर पर भगवान कृष्ण को लेकर आगे बढ़ते रहे। इसी यात्रा से जुड़ी सनातन परंपरा में शेषनाग का प्रसंग भी आता है। मान्यता है कि शेषनाग ने अपने फनों से बालक कृष्ण की रक्षा की। आखिरकार वसुदेव जी यमुना पार करके गोकुल पहुँचे। वहाँ नंद बाबा और माता यशोदा के घर एक कन्या का जन्म हुआ था। वसुदेव जी ने बालक कृष्ण को वहाँ सुला दिया और उस कन्या को लेकर वापस मथुरा लौट आए। जब कंस को देवकी की आठवीं संतान के जन्म की खबर मिली, तो वह कारागार पहुँचा। लेकिन जैसे ही उसने उस नवजात कन्या को मारने की कोशिश की, वह उसके हाथ से छूटकर आकाश में देवी के रूप में प्रकट हुई। और कंस को चेतावनी दी— जिससे तुम्हें भय है, वह जन्म ले चुका है। कंस समझ गया कि उसका अंत अब निश्चित है। उधर गोकुल में नंद बाबा के घर आनंद छा गया। कृष्ण के जन्म का उत्सव मनाया गया। और इसी आनंद की स्मृति आज भी जन्माष्टमी पर मनाई जाती है। जब रात के 12 बजे भक्त भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव मनाते हैं, तो कई घरों में एक विशेष परंपरा निभाई जाती है। पूजा में डंठल वाला खीरा रखा जाता है। कुछ परिवारों में उसके भीतर बाल गोपाल की छोटी प्रतिमा या प्रतीक भी रखा जाता है। पूरे दिन उसे ढककर रखा जाता है। फिर आधी रात को जब कृष्ण जन्म का समय आता है, तब खीरे का डंठल काटा जाता है। कहीं इसे चाकू से किया जाता है तो कहीं अलग-अलग स्थानीय परंपराओं के अनुसार अन्य तरीके भी मिलते हैं। डंठल के अलग होते ही बाल गोपाल के जन्म का उत्सव मनाया जाता है। शंख बजता है। घंटियां बजती हैं। आरती होती है। और पूरा घर गूंज उठता है— “नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की!” लेकिन इस परंपरा का सबसे सुंदर अर्थ उस छोटे से डंठल में छिपा है। जिस प्रकार शिशु के जन्म के बाद गर्भनाल से अलग होने की प्रक्रिया होती है, उसी का प्रतीकात्मक रूप इस परंपरा में खीरे के डंठल को अलग करने से जोड़ा जाता है। इसीलिए इसे कई जगह भगवान कृष्ण के जन्म और नाल छेदन की प्रतीकात्मक क्
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