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Rama Devi Sahu

9 days ago

माँ चंद्रघंटा की पौराणिक कथा एवं महिमा : या देवी सर्वभूतेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ माँ दुर्गा का तृतीय स्वरूप माँ चंद्रघंटा शक्ति, साहस, शौर्य और धर्म की रक्षा का प्रतीक है। नवरात्रि के तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना की जाती है। उनके मस्तक पर अर्धचंद्र के आकार की घंटी सुशोभित है, जिसके कारण वे चंद्रघंटा कहलाती हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब महिषासुर नामक शक्तिशाली दैत्य का अत्याचार बढ़ने लगा और उसने स्वर्गलोक पर अधिकार करने के उद्देश्य से देवताओं के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया, तब समस्त देवता भयभीत होकर भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव की शरण में पहुँचे। उन्होंने त्रिदेवों को महिषासुर के अत्याचारों से अवगत कराया और उससे मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। देवताओं की व्यथा और महिषासुर के अत्याचारों को देखकर त्रिदेवों सहित समस्त देवताओं के तेज से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई। इसी दिव्य शक्ति ने माँ दुर्गा के स्वरूप में अवतार लिया, जिन्हें माँ चंद्रघंटा के रूप में भी पूजा जाता है। माँ को दिव्य अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित करने के लिए देवताओं ने अपने-अपने आयुध अर्पित किए। भगवान शिव ने त्रिशूल, भगवान विष्णु ने चक्र और देवराज इंद्र ने घंटा प्रदान किया। अन्य देवताओं ने भी माँ को दिव्य अस्त्र-शस्त्र एवं शक्तियाँ भेंट कीं। सिंह पर आरूढ़, दस भुजाओं में विविध अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए माँ चंद्रघंटा का स्वरूप अत्यंत तेजस्वी और प्रतापशाली है। इसके पश्चात माँ ने महिषासुर और उसकी आसुरी शक्तियों के विरुद्ध भीषण युद्ध किया। अपने अदम्य साहस, दिव्य शक्ति और पराक्रम से माँ ने दुष्ट शक्तियों का संहार कर देवताओं को भयमुक्त किया तथा स्वर्गलोक में धर्म की पुनः स्थापना की। माँ चंद्रघंटा का दिव्य स्वरूप हमें संदेश देता है कि जब अधर्म और अन्याय अपनी सीमाएँ लाँघने लगते हैं, तब धर्म की रक्षा के लिए दिव्य शक्ति का प्राकट्य अवश्य होता है। माँ की आराधना से भक्तों को साहस, आत्मविश्वास, निर्भयता और विपरीत परिस्थितियों का सामना करने की प्रेरणा मिलती है। माँ चंद्रघंटा की कृपा समस्त भक्तों पर बनी रहे। माँ सबके जीवन से भय, कष्ट और नकारात्मकता दूर कर सुख, शांति, शक्ति एवं समृद्धि प्रदान करें। 🙏 जय माँ चंद्रघंटा 🙏

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