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रामचरित :उत्तरकाण्ड ३८. भरत सत्रुहन दोनउ भाई | सहित पवनसुत उपबन जाई || बूझहिं बैठि राम गुन गाहा | कह हनुमान सुमति अवगाहा || सुनत बिमल गुन अति सुख पावहिं | बहुरि बहुरि करि बिनय कहावहिं | अर्थात् तुलसीदासजी कहते हैं कि भरतजी और शत्रुघ्नजी , दोनों भाई हनुमानजी के साथ उपवन में गये ; वहाँ बैठकर श्रीरामजी के गुणों की कथाऍं पूछते हैं और हनुमानजी अपनी सुन्दर बुद्धि से उन गुणों में गोता लगा कर उनका वर्णन करते हैं | श्रीरामजी के निर्मल गुणों को सुनकर दोनों भाई अत्यंत सुख पाते हैं और विनय करके हनुमानजी से बार बार कहलवाते हैं | तात्पर्य यह है कि भगवान के भक्तों को भगवान के गुणों की कथाएं बहुत प्रिय लगती हैं जिसे वे बार - बार कहना और सुनना पसन्द करते हैं | जय जय सीताराम |

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