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Rama Devi Sahu

49 days ago

भक्त सलबेग और श्रीजगन्नाथ जी की कृपा.. बहुत समय पहले की बात है। उड़ीसा राज्य में एक मुस्लिम सरदार था – नाम था जगन्नाथ खाँ। वह एक वीर योद्धा था और उसका बेटा सलबेग। एक बार युद्ध में गंभीर रूप से घायल सलबेग को जब कोई सहारा न मिला, तब उसकी माँ, जो एक हिन्दू महिला थी, ने उसे भगवान श्रीजगन्नाथ का नाम लेने को कहा। सलबेग ने मरणासन्न अवस्था में पहली बार "जय जगन्नाथ" का जाप किया। कहते हैं, उसी क्षण उसकी हालत सुधरने लगी। यह अनुभव उसके जीवन का मोड़ बन गया। उसने सारे वैभव छोड़कर भगवान जगन्नाथ की भक्ति में स्वयं को समर्पित कर दिया। सलबेग दिन-रात हरिनाम जपता, भजन गाता और पूरी (पुरी) यात्रा पर निकल पड़ा – श्रीमंदिर में भगवान के दर्शन के लिए। जब वह पूरी पहुँचा, तब रथ यात्रा शुरू होने वाली थी। लेकिन दुर्भाग्यवश, वह देर से पहुँचा और रथ यात्रा निकल चुकी थी। वह व्याकुल होकर जगन्नाथजी के रथ के पीछे दौड़ा और पुकारने लगा — "हे प्रभु! मेरे लिए तो आप ही सब कुछ हैं। अगर आप ही नहीं रुके, तो मैं किसके आगे अपने भाव अर्पित करूँ?" उसकी पुकार इतनी भावपूर्ण थी कि कहते हैं, भगवान जगन्नाथ का रथ एकाएक रुक गया। कोई भी उसे आगे खींच न सका। पुजारी, राजा, सेवक सब चकित रह गए। सलबेग दौड़कर आया, रथ के सामने गिर पड़ा, और आँसुओं के साथ भगवान को नमन किया। जब तक उसने प्रभु के दर्शन न कर लिए, रथ आगे नहीं बढ़ा। तभी से, जगन्नाथ जी की रथ यात्रा में एक विशेष पड़ाव 'सलबेग समाधि' के पास होता है, जहाँ रथ कुछ समय विश्राम करता है। यह कथा दर्शाती है कि भगवान जात-पात,धर्म,कुल या रूप नहीं देखते। वह केवल सच्ची भक्ति और मन की पुकार सुनते हैं। जो भी अपने ह्रदय से उन्हें पुकारता है,वे अवश्य उसके पास आते हैं..!! जय श्री जगन्नाथ ‼️ JAI JAGANNATH MAHAPRABHU JI 🙏🌹⭕‼️⭕🌹🙏

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