
Rama Devi Sahu
91 days ago
एक बार की बात है। एक साधु कई वर्षों से तपस्या और साधना करते हुए गाँव-गाँव भ्रमण कर रहा था। वह किसी भी स्थान पर अधिक समय नहीं रुकता था। एक दिन चलते-चलते वह एक नदी के किनारे बने पनघट पर पहुँचा। लंबी यात्रा के कारण वह बहुत थक चुका था। उसने नदी का शीतल जल पिया और विश्राम करने के लिए पास पड़े एक समतल पत्थर पर सिर रखकर लेट गया। कुछ ही क्षणों में उसे नींद आ गई। वह पनघट गाँव की स्त्रियों का प्रमुख जलस्रोत था। दिन भर वहाँ पनिहारिनों का आना-जाना लगा रहता था। थोड़ी देर बाद कुछ पनिहारिनें पानी भरने वहाँ पहुँचीं। उन्होंने साधु को सोते देखा। पहली पनिहारिन मुस्कराकर बोली, “देखो तो, साधु बन गए हैं, लेकिन तकिए का मोह अभी भी नहीं गया। तकिया भले ही पत्थर का हो, पर सिर के नीचे रखा तो है ही।” उसकी बात साधु के कानों तक पहुँच गई। उसे लगा कि शायद वह वास्तव में किसी वस्तु के मोह में बँधा हुआ है। उसने तुरंत उठकर वह पत्थर एक ओर फेंक दिया और फिर बिना किसी सहारे के लेट गया। कुछ समय बाद दूसरी पनिहारिन वहाँ आई। उसने यह दृश्य देखा और बोली, “अरे! यह कैसे साधु हैं? जरा-सी बात सुनकर नाराज़ हो गए। अभी तक क्रोध और अहंकार नहीं गया। तभी तो पत्थर फेंक दिया।” यह सुनकर साधु असमंजस में पड़ गया। उसने सोचा, “मैंने तो मोह छोड़ने के लिए पत्थर हटाया था, लेकिन लोग उसका भी दूसरा अर्थ निकाल रहे हैं।” वह चुपचाप बैठ गया और सोचने लगा कि आखिर सही क्या है। तभी तीसरी पनिहारिन वहाँ पहुँची। उसने साधु के चेहरे पर चिंता देखी और बोली, “बाबा, यह पनघट है। यहाँ रोज़ अनेक लोग आएँगे और अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार बातें करेंगे। यदि आप हर व्यक्ति की बात सुनकर अपने व्यवहार में परिवर्तन करते रहेंगे, तो साधना कब करेंगे? दूसरों की बातों में उलझकर कोई भी अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकता।” साधु को उसकी बात उचित लगी, लेकिन तभी चौथी पनिहारिन ने एक और गहरी बात कही। वह बोली, “महात्मा जी, क्षमा कीजिएगा, पर मुझे लगता है कि आपने संसार की बहुत-सी वस्तुएँ तो छोड़ दी हैं, लेकिन संसार की राय को अभी तक नहीं छोड़ा। आपका चित्त अभी भी लोगों की बातों में उलझा हुआ है। यदि कोई आपको पाखण्डी कहे तो कहने दीजिए। यदि कोई आपकी प्रशंसा करे तो भी उससे प्रभावित मत होइए। आप जैसे हैं, वैसे ही रहकर अपना कर्तव्य और साधना करते रहिए।” फिर उसने मुस्कराकर कहा, “दुनिया का काम है कहना। आप ऊपर देखकर चलेंगे तो लोग कहेंगे कि घमंडी हो गए हैं। नीचे देखकर चलेंगे तो कहेंगे कि किसी की ओर देखते ही नहीं। आँखें बंद करेंगे तो कहेंगे कि ध्यान का दिखावा कर रहे हैं। चारों ओर देखेंगे तो कहेंगे कि नज़र का कोई ठिकाना नहीं। और यदि इन सब बातों से परेशान होकर स्वयं को बदलते रहेंगे, तब भी लोग कुछ न कुछ कहेंगे ही।” साधु बड़े ध्यान से उसकी बातें सुनता रहा। पनिहारिन आगे बोली, “महात्मा जी, ईश्वर को प्रसन्न करना आसान है, लेकिन संसार को प्रसन्न करना असंभव है। क्योंकि संसार की अपेक्षाएँ कभी समाप्त नहीं होतीं। जो व्यक्ति हर किसी को खुश करने की कोशिश करता है, वह अंततः स्वयं दुखी हो जाता है। इसलिए लोगों की बातों से अधिक अपने विवेक की आवाज़ सुनिए।” यह सुनकर साधु के मन का भ्रम दूर हो गया। उसे समझ आ गया कि सच्ची साधना बाहरी वस्तुओं को छोड़ने में नहीं, बल्कि लोगों की प्रशंसा और आलोचना से ऊपर उठने में है। उस दिन के बाद उसने न तो लोगों की निंदा से दुखी होना सीखा और न ही प्रशंसा से प्रसन्न होना। वह अपने मार्ग पर स्थिर होकर आगे बढ़ता रहा। शिक्षा: दुनिया को संतुष्ट करना कभी संभव नहीं है। लोग हर परिस्थिति में कुछ न कुछ कहेंगे। इसलिए दूसरों की राय के पीछे भागने के बजाय अपने कर्तव्य, अपने लक्ष्य और अपने विवेक पर ध्यान देना चाहिए। याद रखिए—ताले का मुँह बंद किया जा सकता है, लेकिन संसार का मुँह कभी बंद नहीं किया जा सकता। ...✍️

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