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रामचरित :उत्तरकाण्ड २१. सुनु खगपति यह कथा पावनी | त्रिबिध ताप भव भय दावनी || महाराज कर सुभ अभिषेका | सुनत लहहिं नर बिरति बिबेका || जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं | सुख संपति नाना बिधि पावहिं || सुर दुर्लभ सुख करि जग माहीं | अंतकाल रघुपति पुर जाहीं || अर्थात् तुलसीदासजी कहते हैं कि कागभुशुण्डिजी बोले कि हे गरुड़जी ! सुनिये , महाराज श्रीरामचन्द्रजी के कल्याणमय राज्याभिषेक का यह चरित्र (कथा) सबको पवित्र करने वाला है तथा तीनों प्रकार के दैहिक , दैविक और भौतिक तापों एवं भव (जन्म- मृत्यु) के भय का नाश करने वाला है जिसे निष्कामभाव से सुनने पर मनुष्य वैराग्य एवं ज्ञान की प्राप्ति करते हैं परन्तु जो मनुष्य सकामभाव से इस कथा को सुनते और गाते हैं , वे अनेकों प्रकार के सुख और सम्पत्ति पाते हैं | वे जगत में देव- दुर्लभ सुखों को भोगकर अन्तकाल में श्रीरघुनाथजी के परमधाम को जाते हैं | तात्पर्य यह है कि जो लोग राजा रामचन्द्रजी के राज्याभिषेक के त्रयतापनसावन एवं पवित्रकारी चरित्र को निष्काम भाव से सुनते हैं वे वैराग्य और ज्ञान की प्राप्ति करते हैं और जो इसे सकाम भाव से सुनते और गाते हैं वे जीवन में अनेकों प्रकार के सुख- सम्पत्ति पाते हैं और जगत में देव-दुर्लभ सुखों को भोगकर अन्तकाल में श्रीरघुनाथजी के परमधाम को जाते हैं | जय जय सीताराम | 🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹

Comments (1)

Pannalal panchal

Pannalal panchal

Aug 14, 2026

ॐ नमो नारायण नारायण हरि हरि