
Rama Devi Sahu
50 days ago
एक पवित्र मंदिर में एक बूढ़ा साधू और एक छोटा सा चूहा रहा करते थे। वह चूहा अक्सर साधू महाराज की खाने-पीने की चीज़ें और अन्य सामान खा जाता था, जिससे साधू जी बहुत ज्यादा परेशान और दुखी रहते थे। एक दिन मंदिर में एक चतुर बनिया आया। साधू जी ने उसके सामने अपनी यह व्यथा रखी और पूछा कि इस चूहे की हरकतों से कैसे छुटकारा पाया जा सकता है? बनिये ने गहराई से सोचते हुए कहा कि वह चूहा बहुत ही आत्मविश्वासी है और अवश्य ही उसके पास कहीं न कहीं अनाज का एक बड़ा भंडार छुपा हुआ है। जब तक उस चूहे को यह पक्का विश्वास है कि उसे बिना किसी परेशानी के खाना मिलता रहेगा, तब तक वह पूरी तरह से निडर और बेखौफ रहेगा। 🐭🤔 बनिये ने साधू जी को एक उपाय सुझाया कि सबसे पहले हमें उस चूहे के अनाज के भंडार का पता लगाना होगा और फिर उसे पूरी तरह से खत्म करना होगा। इसके बाद, साधू और बनिये ने मिलकर मंदिर के कोने-कोने को खंगाला और आखिरकार चूहे का बिल ढूंढ निकाला। उन्होंने उस बिल के भीतर छुपाकर रखा गया सारा अनाज बाहर निकाल दिया। जब चूहा घूम-फिर कर वापस अपने बिल में लौटा, तो अपने अनाज के भंडार को पूरी तरह खाली देखकर वह अत्यंत दुखी और व्याकुल हो गया। 😢🌾 अगले दिन से उस चूहे के मन में भविष्य के भोजन को लेकर गहरी चिंता समा गई, जिसके कारण उसका पुराना आत्मविश्वास पूरी तरह से टूट गया। मन में डर और निराशा बैठने की वजह से वह अब न तो पहले की तरह फुर्ती से दौड़ पा रहा था और न ही ऊंची छलांग लगा पा रहा था। धीरे-धीरे उसका मनोबल गिरता गया और वह हताश रहने लगा। अंततः, पूरी तरह से निराश होकर उसने वह मंदिर हमेशा-हमेशा के लिए छोड़ दिया। 🐀📿 इस कहानी से हमें यह अनमोल सीख मिलती है कि जीवन में यदि आत्मविश्वास खत्म हो जाए, तो मनुष्य का सब कुछ खत्म हो जाता है। मन की निराशा इंसान को भीतर से हताश कर देती है और यही निराशा आगे चलकर जीवन में असफलता को जन्म देती है। इसलिए विपरीत परिस्थितियों में भी अपना हौसला कभी नहीं खोना चाहिए। 🌟🙏
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