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Rama Devi Sahu

292 days ago

जब श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण वन के मार्ग पर निकल पड़े… अयोध्या की धरती रो रही थी, कौशल्या की आँखें नम थीं, और पूरा नगर मानो विरह में डूब गया था। परन्तु प्रभु का मार्ग भक्ति से भरा था— और उस मार्ग पर मिलने वाले थे निष्कपट हृदय वाले भक्त – निषादराज गुह। श्रीराम गंगा तट पहुंचे। वहाँ निषादराज गुह ने प्रभु को देखा… देखते ही उसकी आँखें भर आईं। वह राजमहलों और दरबारों का आदी नहीं था— पर उसका हृदय, बस राम-प्रेम से भरा हुआ था। उसने आगे बढ़कर श्रीराम के चरणों को पकड़ लिया— “प्रभु…! आप मेरे घर आए… यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है।” गुह की आँखें प्रेम से चमक रही थीं, उसने कहा— “प्रभु, मेरे पास देने को वैभव नहीं… पर मेरा हृदय सदैव आपका है।” श्रीराम ने मुस्कुराकर कहा— “गुह! प्रेम से बड़ी कोई भेंट नहीं।” रात आई। श्रीराम और माता सीता पेड़ों के नीचे विश्राम करने लगे। पर गुह सोया नहीं… उसने अपने तीर-कमान हाथ में लिया और सारी रात पहरा दिया। क्योंकि प्रेम का स्वरूप स्वार्थहीन सेवा है। सुबह हुई। गंगा पार करनी थी। गुह ने नाव तैयार करवाई… पर उस नाव को चलाने की अनुमति देने कोई तैयार नहीं था। क्योंकि सब जानते थे— प्रभु के चरणों का स्पर्श पत्थरों को भी दिव्य कर देता है। पर गुह हँसते हुए बोला— “प्रभु, नाव की चिंता मत कीजिए… नाव भी मेरी है, और जीवन भी मेरा आपका ही है।” और फिर प्रेम और आँसुओं के बीच… गंगा की लहरों ने श्रीराम को आगे बढ़ाया।

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Comments (4)

Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

Nov 14, 2025

kuch kaam tha... isi liye...

Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

Nov 14, 2025

Jai Shree Shyam 🙏🌹🌹

Rakesh Kumar

Rakesh Kumar

Nov 14, 2025

aap aaj kha thi subah se aap online nhi aai aap theek ho

Rakesh Kumar

Rakesh Kumar

Nov 14, 2025

jai shree shyam 🙏