MyMandirInstall
Profile

Rama Devi Sahu

131 days ago

कावेरी नदी की कहानी भारतीय पौराणिक कथाओं में बहुत ही रोचक है। यह कहानी न केवल भक्ति और समर्पण को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि कैसे एक व्यक्ति का दृढ़ संकल्प जन-कल्याण का कारण बनता है। कावेरी की उत्पत्ति की कहानी मुख्य रूप से दो भागों में बंटी हुई है: उनका 'विष्णु पुत्री' के रूप में जन्म और 'अगस्त्य मुनि' के कमंडल से नदी बनना। पौराणिक कथाओं के अनुसार, ब्रह्मदेव की एक मानस पुत्री थी, जिनका नाम 'विशमाया' था। उन्होंने भगवान विष्णु की कठोर तपस्या की ताकि वे उनके चरणों की सेवा कर सकें। भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि वे अगले जन्म में 'कावेर' नाम के राजा की पुत्री के रूप में जन्म लेंगी। राजा कावेर ने संतान प्राप्ति के लिए ब्रह्मगिरि पर्वत पर तपस्या की थी। वरदान स्वरूप उन्हें वही दिव्य कन्या प्राप्त हुई, जिसका नाम 'कावेरी' रखा गया। कावेरी बचपन से ही बहुत आध्यात्मिक थीं। वे चाहती थीं कि उनका अस्तित्व ऐसा हो कि वे समस्त संसार के पापों को धो सकें और प्यासी धरती को तृप्त कर सकें। एक समय दक्षिण भारत में भयानक सूखा पड़ा था। ऋषियों और मुनियों ने इसके समाधान के लिए प्रार्थना की। उसी दौरान महान महर्षि अगस्त्य ने कावेरी की सुंदरता और भक्ति को देखकर उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा। कावेरी ने एक शर्त पर विवाह स्वीकार किया: "स्वामी, यदि आप मुझे कभी भी अकेला छोड़कर कहीं दूर जाएंगे, तो मैं स्वतंत्र होकर बहने लगूंगी।" अगर आपको कथा संग्रह की पोस्ट पसंद आती है तो आज ही सब्सक्राइब करें कथा संग्रह अगस्त्य मुनि ने यह शर्त मान ली। लेकिन एक दिन, महर्षि अगस्त्य एक गहरी चर्चा में इतने मग्न हो गए कि वे कावेरी को अपने कमंडल में सुरक्षित रख कर पास के जलाशय में स्नान करने चले गए। भगवान इंद्र और अन्य देवता चाहते थे कि कावेरी एक नदी का रूप ले लें ताकि दक्षिण भारत का सूखा समाप्त हो सके। इसलिए उन्होंने भगवान गणेश की सहायता मांगी। जब अगस्त्य मुनि ध्यान में थे, तब गणेश जी ने एक छोटे कौवे का रूप धारण किया और अगस्त्य मुनि के कमंडल पर जाकर बैठ गए। जब अगस्त्य मुनि ने कौवे को हटाने के लिए हाथ हिलाया, तो कौवे ने चतुराई से कमंडल को पलट दिया। जैसे ही कमंडल का पवित्र जल जमीन पर गिरा, कावेरी ने एक विशाल नदी का रूप ले लिया और ढलान की ओर बहने लगीं। जब अगस्त्य मुनि ने देखा कि उनका कमंडल उलट गया है और कावेरी नदी बनकर बह रही हैं, तो वे क्रोधित हो गए और कौवे के पीछे भागे। तब गणेश जी ने अपने असली रूप में दर्शन दिए और समझाया कि यह सब लोक-कल्याण के लिए हुआ है। कावेरी ने अपनी शर्त याद दिलाई कि उन्हें अकेला छोड़ा गया था, इसलिए अब वे नदी के रूप में जन-जन की प्यास बुझाएंगी। अगस्त्य मुनि ने इसे ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार कर लिया। कावेरी का महत्व (तालकावेरी) आज भी कर्नाटक के कोडागु जिले में 'तालकावेरी' नाम का स्थान है, जहाँ से यह नदी निकलती है। हर साल अक्टूबर के महीने में यहाँ 'तुला संक्रमण' का त्यौहार मनाया जाता है। माना जाता है कि इस दिन एक निश्चित समय पर कुंड में पानी अचानक ऊपर की ओर उछलता है, जिसे देवी कावेरी का साक्षात प्राकट्य माना जाता है। कावेरी को दक्षिण भारत में वही सम्मान प्राप्त है जो उत्तर भारत में गंगा को है। एक दिलचस्प बात: कावेरी नदी के किनारे ही प्रसिद्ध श्रीरंगम मंदिर (भगवान विष्णु का निवास) स्थित है, जिससे उनकी वह इच्छा भी पूरी हुई कि वे सदैव भगवान के चरणों के पास रहें।

Post media

Comments (0)

No comments yet. Be the first to comment!