
Rama Devi Sahu
199 days ago
वृन्दावन की संकरी गलियों में माधव की मिठाई की दुकान थी। उसकी दुकान पर बांके बिहारी जी का एक छोटा सा चित्र हमेशा मुस्कुराता रहता था, और माधव अपनी हर मिठाई का पहला टुकड़ा उसी चित्र को अर्पित करता। माधव कोई बड़ा व्यापारी नहीं था, बस एक साधारण हलवाई था जिसकी कमाई उसके पेट और बिहारीजी की सेवा के लिए काफी थी। पर उसके हाथों में एक जादू था, क्योंकि वह हर मिठाई को अपने लाला (बांके बिहारी) के लिए प्यार और भक्ति से बनाता था। एक दिन, पूरे शहर में यह खबर फैली कि बिहारीजी की सवारी निकलने वाली है। माधव का मन उमंग से भर गया। उसने सोचा कि आज वह अपने लाला के लिए कुछ खास बनाएगा। उसने बड़ी मेहनत और लगन से एक बड़ा सा 'घेवर' (राजस्थानी मिठाई) बनाया, उसे केसर, बादाम और चांदी के वर्क से सजाया। वह घेवर इतना सुंदर और स्वादिष्ट था कि उसे देखकर ही मन तृप्त हो जाता। माधव ने घेवर को एक थाली में रखा और बड़ी सावधानी से उसे लेकर मंदिर की ओर चल पड़ा। मंदिर की गलियों में भीड़ इतनी ज्यादा थी कि तिल धरने की भी जगह नहीं थी। लोग धक्का-मुक्की कर रहे थे, और माधव को डर था कि कहीं उसका बनाया हुआ घेवर कुचल न जाए। किसी तरह वह मंदिर के भीतर पहुंचा, पर गर्भगृह के पास जाने का तो सवाल ही नहीं था। वह पीछे भीड़ में फंस गया। माधव का मन उदास हो गया। उसकी आँखों से आँसू छलक आए। उसने मन ही मन बिहारीजी को पुकारा, "लाला, मैंने यह घेवर सिर्फ तुम्हारे लिए बनाया था। पर मैं इसे तुम्हें चढ़ा भी नहीं पा रहा।" उसने देखा कि एक छोटा सा बालक, जिसकी आंखें बहुत सुंदर थीं, उसकी ओर देख रहा है। बालक ने मीठी आवाज़ में कहा, "अरे हलवाई, क्या मेरे लिए कुछ नहीं है?" माधव ने सोचा कि यह बालक शायद भूखा है। उसने अपनी निराशा को एक तरफ रखा और प्रेम से उस घेवर को बालक को दे दिया। बालक ने उसे खाया और मुस्कुराकर बोला, "बहुत स्वादिष्ट है, हलवाई।" फिर वह भीड़ में गायब हो गया। माधव अपने खाली हाथ को देखकर थोड़ा दुखी हुआ, पर बालक की खुशी देखकर उसे शांति मिली। अगले दिन, सुबह-सुबह जब मंदिर के पट खुले, तो सारे पुजारी और भक्त अचंभित रह गए। बिहारीजी के मुँह पर घेवर का एक टुकड़ा लगा हुआ था, और उनके चेहरे पर एक मनमोहक मुस्कान थी। पुजारी उसे साफ करने की कोशिश कर रहे थे, पर वह साफ नहीं हो रहा था। तभी मुख्य पुजारी ने मुस्कुराकर घोषणा की, "आज किसी भक्त ने इतने प्रेम से भोग लगाया है कि बिहारीजी ने स्वयं उसे ग्रहण किया है।" पुजारी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि यह कैसे हुआ। लेकिन तभी उनकी नज़र भीड़ में खड़े माधव पर पड़ी। माधव के चेहरे पर हैरानी और आँखों में खुशी के आँसू थे। पुजारी ने माधव को पहचान लिया, क्योंकि वह हर दिन अपनी मिठाइयों का पहला टुकड़ा बांके बिहारी के चित्र को चढ़ाता था। पुजारी ने मुस्कुराकर माधव की ओर देखा और कहा, "तुम्हारे प्रेम का भोग बिहारीजी ने स्वीकार कर लिया है।" माधव समझ गया कि जिस बालक को उसने घेवर दिया था, वह कोई और नहीं, स्वयं उसका लाला ही था। माधव के लिए वह दिन सबसे बड़ा तीर्थ बन गया। उसे यह एहसास हो गया कि प्रेम से दिया गया हर छोटा सा भोग भगवान तक पहुँच जाता है, चाहे वह मंदिर में हो या किसी भूखे बालक के हाथ में।


